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Showing posts from April, 2019

अब बस!

काश कि कोई "काश"होता! दरम्यान हमारे तुम्हारे! किन्तु अब आस भी नही तो "काश!" कैसे होगा! हा अनन्त हो तुम अब मुझमे साथ नही है बस ये जानो! सत्य ये भी है कि मेरी पात्रता भी नही है साथ की! और अब......बिखरा हुआ-सा मैं न जाने कितने चेहरे गुजरे हैं मुझसे होकर! न जाने कौन-से रास्ते होंगे न जाने कौन सी मंज़िल होगी! तुम हो! तुम रहोगी मुझमे! एक द्वीप जैसे रहता है सागर में ही किन्तु जुदा-जुदा! न जाने तुम कौन थी न जाने राह कौन थी! मै तो गया ! मय में हु मैं भय नही है कोई लय में हूँ मै न राधा न रुक्मिणी कोई नही मिली मैं तो मीरा के संग हो चला! नही मैं कृष्ण न ही मैं राम! अदना-सा आदम! जाओ तुम दूर इस सागर से द्वीप काश की कोई अगस्त होता जो द्वीप को मुकम्मल कर देता!

माँ

कोई नही आएगा तुम्हारे पास,कोई भी नही, ये हो सकता है कि तुम्हे लगे कि एक भीड़ गुजर रही है तुम्हारे इर्दगिर्द.... उन्हें अपना मत समझना,अपना समझने की भूल मत करना!ये आवागमन जारी रहेगा आत्मतत्व से सभी एक ही पेड़ के पत्ते हैं! वो पत्ते जो कभी मिलते नही एक दूसरे से उनका काम है बहना! हवाओं के साथ ,उनका काम है झूमना फिज़ाओं के साथ! तुम भी झूमो तुम भी चूमो माँ है सृष्टि ! माँ है शक्ति माँ ही सारा जीवन है! रक्त कणों में बहता समय है! और समय ही आत्मा है!