Posts

Showing posts from March, 2018

विरह में प्रेम

Image
विरह में प्रेम संवर्द्धित होता, जो-न विकसित हो, वो वासना मात्र का प्रतिरूप होता है! प्रत्येक विरह प्रेम को मजबूत करने हेतु ही है,और यदि वासना का हो अंश तो उसे करने आता है विरह.. नष्ट! विरह आत्मिक सम्पदा के श्री वृद्धि हेतु होता है! और कल्मष को धुलने हेतु होता है।। विरह की अपनी एक विशिष्ट रूपरेखा होती है जो अध्य्यात्मिक ढांचे के श्रीवृद्धि के लिए ही परमात्मा द्वारा रचित है।। प्रेम सर्वत्र व्याप्त होकर भी मनुष्य कृत होता है और विरह प्रत्येक दशा में परमात्मा का प्रसाद होता है!।।

अट्ठहास!

Image
रास्ते-से जा रहा था, गुरुवर से मिलने! उनका सामीप्य ही मुझे सहजावस्था में बहुत कुछ सीखा देता है।। ज्योहीं रुस्तमपुर से आगे रामगढ़-झील के निकट पहुंचा चक्रवात प्रारम्भ हो गया प्रचण्ड तूफान प्रारम्भ हुआ मुझे गरीबों के झोपड़ियों की फिक्र सालने लगी।। गुरु जी ने तो ऋतुराज का रूदन कहा(भूमि से विदाई का) किन्तु मैंने निर्भीक हँसी देखी बदतमीजी मानवता की है अम्लीय-वर्षा ओलावृष्टि देखी।। प्रकृति अजेय है एक ही मार्ग है इसे विजित करने का कि विजित होने की अभिलाषा त्याग प्रकृति को महत्ता देकर छायादार वृक्ष लगाए जाएं जल-संरक्षण किया जाए।। और जो अमीर एयर-कंडीशनर से अपने को शीतलता प्रदान कर रहे हैं उनसे टैक्स लेकर वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाए तब यथार्थ साम्यवाद स्थापित होगा अन्यथा नही।। प्रकृति के प्रकोप तब जाकर कम प्रभावी होगी।।

पुकार माँ भारती का!

ये स्मित तेरा हे पुत्र! करे कुछ कमाल इस तरह कोई देख कलाम हो जाये, कोई कृष्ण कबीर! अहंकार का भक्षण करना पथ में मिले गर कोई शूल! मानवता-परचम समृद्धि की अभिवृद्धि! हे भारत अब जगो तुम भी सुनो पुकार विश्व की तुम!

मुक्तिबोध!

Image
बेवजह-सी छटपटाहट है तुम्हारे विरह में प्रिय।। महसूस तो तुम हो ही, आती-जाती साँस के साथ।। फिर मुझे पता करना है कि ये छटपटाहट हैं क्यों आखिर।। जीवन का अगला-क्षण कैसा होगा अनुभूति का विषय है ये।। निःसंदेह ये छटपटाहट उधर भी है मैं आँखों से अपनी देख सकता हूँ।। जब तय है अब की तुम मात्र 'याद' ही हो तो क्यों न कर समझौता इनसे मैं भी मुक्त हो ही जाऊं! कोई प्रणय निवेदन नही मेरी दुनिया मेरे भीतर ही है।। तुम जहां भी रहो प्रसन्नचित रहो! मेरा क्या? अभी जख्म नया है-पुराना हो जाएगा! वक़्त-दर-वक़्त कारवाँ गुजर ही जायेगा!

रोग!

Image
मुझे रोग है, भारत के रोग जैसा ५.५ टैबलेट रात्रि ३.५ सुबह, और १ दोपहर! उसके बाद भी नींद नही मेरा परिवार मुझे,मनोवैज्ञानिक मनोचिकित्सक के पास लेकर जाता है! और वो चिकित्सक मुझे दवाएँ देता है,जब दवाएँ प्रभावित कर मुझे अपाहिज बना देती हैं तब मेरे अपने चैन की नींद सोते है! फिर भी कांपती शरीर के साथ मैं हौसले को बुलंद रखता हूँ और मुझे बस अनुग्रहपूर्ण रहना आता है चाहे कोई विष दे,अपशब्द कहे सबके प्रति अनासक्त अनुग्रहपूर्ण रहना है मुझे! क्योंकि इसी जीवन मे मुझे मोक्ष मिलना निश्चित है,सारे जन्मों के कुकर्मों के प्रतिफल मुझे इसी जन्म में भोग! आवागमन से मुक्त होना हैं! कुछ लोग मुझे पागल भी कहते हैं मैं उसे भी स्वीकार करता हूँ पा-पाने के लिए ग-गतिशील है जो व्यक्ति ल-लक्ष्य! दरसल कोई मुझे क्या दे सकता है जब सृस्टि के जनक ही मेरे पालक हैं! इस दुनिया के अबतक की यात्रा में मिले प्रत्येक व्यक्ति को अनुग्रह! सृस्टि के प्रत्येक कण-क्षण-स्थान सबको अनुग्रह!

भारती..१

Image
मैं अपने अंतिम सांस तक विश्व की समृद्धि लिखता रहूंगा आसक्ति वश नही,कर्तव्य,निष्काम कर्तव्य वश।। और पूरे विश्व का मुखिया मेरा भारत है,ऐसा सनातन काल से है! चंद नफरती, और चोरों को भी सब त्याग भारत के मुखिया बनने में सहयोग करना होगा।। भारत और भ्रष्टाचार का दूर-दूर तक कोई नाता नही, जो छिटपुट लोग है,उन्हें भी बोध होगा वो भी सुधरेंगे!

भारती!

Image
फट रही है पौ हिमालय गा रहा गीत इक।। कश्मीर से कन्याकुमारी बह रही है गीत प्यारी तुम भी सुन लो,मैं भी सुन लूं गान ये अद्भुत यहाँ।। जो हैं अज्ञानी यहाँ ओछी है जिनकी-प्रवृत्ति उनको भी तुम करुणा दे दो प्रेम से भर दो हृदय।। बेटियों और माओं को सम्मान देकर प्यारे तुम करो फ़र्ज़ अदा तुम माँ भारतीय स्वभाव का।। निश्चित ही ये होगा हो रहा है और हुआ भी है! विश्व के हो मार्गदर्शक तुम, शांति के हो अग्रदूत ।। समृद्धि होगी धरा पर संगठित ज्यों ही हुए तुम एक भारत-भारतीय के अतिरिक्त कुछ नही हो तुम।। बह चुका है तमस सारा खिल-रही है ज्योत्सना आ रहा है विश्व भारत को बनाने गणपति! सुन लो प्यारे,गुण लो प्यारे आ गयी समृद्धि अब!!

सनक से संकल्प!

Image
इतिहास में कोई व्यक्ति जो विशिष्ट रहा हो,सनक के बगैर ये असंभव है।अब यदि आप सनकी है तो प्रथमतः ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करिये।द्वितीयतः आप लोगों का प्रतियुत्तर देना बंद करिये;अर्थात उद्दंडतापूर्वक रहना बन्द करके अपनी सनक में ही रहना सीखिये एवं प्रसन्नचित रहिये अपनी सनक में। जब आप पूर्ण सनकी हो जाये एक विशिष्ट संकल्प जागृत होगा, विशुद्ध सनक,इसी को सनकल्पगीत बनाइये एवं अपने आपका,होने के मर्म को जानिये। फिर आप स्वयम्प्रकाश हो जाएंगे। पूरी दुनिया आप भ्रमण कर लेंगे एक झटके में क्योंकि अब आप योगस्थः हो गए है। असम्भव विलीन होगा एवं सम्भव की संभावनाएं और प्रगाढ़ हो जाएंगी।

माया!

कुछ तो हो तुम,सबब या सबक! कि तुम्हारी स्मृति प्रत्यक्ष  होते ही बरबस नयन अश्रुपूरित होता जाता है! सबक या सबब लाघव या अतिरेक कुछ तो है तुमसे सम्बंधित मेरा! इतने अरषों तक एक भी सांस तुम्हारे बगैर नही! मेरे विश्लेषण में तुम मध्या हो! उत्तप्त-छाँव की सन्ध्या हो! जीवंत जगत की माया भी! जो मुक्त करे वो काया भी!

नशा!I

Image
मैं क्यों लिखता हूँ इसलिए कि जिस पुनरावृत्ति से मैं परेशानी में पड़ा वो मेरे पाठकों को न उठानी पड़े! एक सहज इंसान हूं कि नही ये मैं कैसे उद्घोष करूँ किन्तु सहज-सरल-विनीत बनने के मार्ग मे जो चौराहें आते हैं वहाँ मैं आपका मार्गदर्शक बन सकूँ! और एक सत्य,मेरी अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति जीनियस हैं और किसी को मैं कुछ सीखा पाऊँ इस भाव से नही लिखता हूँ! जैसे कुतिया अपने पिल्लों को भोजन उल्टी कर खिलाती है, मैं भी विचारों की उल्टी करता हूँ ताकि दस्त न हो! मेरे होने तक ही या मेरे जाने के बाद एक बड़ी संख्या जागृत हो रही है एवं होगी भी! इसमे मेरा कोई श्रेय नही हैं! मैं मात्र एक अनुवादक हुँ, और एक धोबी भी हूं जो कहने से गधे पर नही बैठता अपितु अपने-आप बैठ जाता हैं,मैं वहीं बैठ भी पाता हूँ जहाँ जागृति होने की सम्भावना होती है! मैं विचित्र धोबी हूँ मैं कपड़ा नही धोता, मन-के-मैल को धोता हूँ जिससे कि आप खुद से मिल लें! औऱ ज्योंही आप जागृत हुए मैं स्थुल रूप से अदृश्य होकर चेतन-रूप में सर्वस्व व्यापित हो जाता हूँ। तुम्हारी नसों में आत्मबोध का एक नशा चढ़ता हैं जो आपके अध्य्यात्...

तूफ़ान के बाद!

Image
आज फिर तूफान आया! मातम छाया! किन्तु कल फिर फुर्सत में होगी ज़िन्दगी! पुष्प खिलेंगे बसन्त के खेत लहल्हायेंगे जीवन में सारे गीले-शिक़वे फिर... फिर दूर होंगे जीवन से.. तूफ़ानी बवंडर की आयु नही है थोड़ी भी! हा किन्तु ये बवंडर तुम्हे मज़बूत स्तम्भ बनाने आयी थी! मज़बूत  करो खुद को! अभी घोर तपस्या शेष ही है!

सन्देश!

मुझमें और तुममें बस फर्क इतना-सा है, तुम्हे चैन से जीना है,मुझे चैन से मरना हैं! माँ, मदिरा, मैथुन,मत्स्य और मुद्रा! जब आप इन पञ्च मकारों से मुक्त होते है तो विद्या,विनय,विवेक, वय,वीरता इन पञ्च वकारों से युक्त होते हैं!

भारत और समृद्धि!

सन-सनन-सन-सन-सन सन्नाटा बोलेगा!........... जिस दिन जागृत भारत बस अपने उर में देखेगा..... जो नेता, अफसर-अधिकारी जीते हैं भारत के धन से... गर थोड़ी भी नियत बिगड़ी...उनका सिंहासन डोलेगा! अब भारत बोलेगा,समृद्धि बोलेगी!

नाभिक!

नाभिक में जब प्रोटान टकराते है तो परमाणु विस्फोट होता है! इसी सिद्धांत पर परमाणु बम बनता है! और जब दो प्रोटान या कण आपस मे मिलते है तो एक जबरदस्त ऊर्जा बनती है, इसे नाभिकीय संलयन कहते हैं सूर्य की अजस्र ऊर्जा के पीछे यही वजह है! इसी तरह जबतक भारत मे विभिन्न मजहब जाति इत्यादि अलग कण रहेंगे भारत का विखण्डन होता रहेगा! किन्तु जिस दिन भारत के लोग मात्र भारतीय होकर सनलयित हो जाएंगे! भारत सूर्य की तरह विश्व को पोसने लगेगा! मर्जी आप की है आप स्वतन्त्र हैं!

उर्वशी!

Image
मुझमें और तुझमें एक रिश्ता तो है.. कि जब मैं डूबता हूँ इश्क़ में तुम्हारे.. निर्जन रातों में मेरे श्वांसों की ध्वनियाँ, सुगंध तुम्हारी रग-रग में मेरे! प्रिय! इस कदर.. समहित होती हैं... मुझमें तुममे अभेद सम्बंध निर्जन रैन, रंग बरसावे तेरे संग हे मेरे प्रिय! स्पर्श तुम्हारा मेरे पाषाण-हृदय को पिघला-पिघला के पारस बनाता जाता.. चुम्बन तुम्हारा,आहिस्ता-आहिस्ता मय को विलीन करता कृष्ण में एक-एक बूंद प्रेम की यूँ स्पर्श करती हमें प्रिय! मैं सन्यस्त होता जाता! बर्फ के हैं ये स्वर्णिम पल कि पिघल-पिघल के मेघ निर्मित कर जाते! और अब एक बारिश होगी जो विश्व की समस्त लकीरों को मिटा देगी! एक विश्व,एक धर्म का उदय हो रहा है! एक धर्म जो निर्ग्रन्थ होगा सहज होगा! पूरा विश्व एक परिवार हो गया। मुझमे और तुममे एक रिश्ता तो है जो दिखता ही दिखता है पर दिखता नही! बस रैना आये... ले जाये मुझको तेरी ओर,उस छोर उड़कर, उछलकर, तैरकर बस रैना आये ले जाये मुझको मुझी से दूर... कर दे रिहा मुझे मुझसे ही... तुम्हारा चुम्बन हहहह! प्रिय! मुझमे और तुझमे एक रिश्ता तो है!

लड़कियाँ!

Image
माँ को कौन छल सकता है, लड़कियां टूटने के लिये नही; सृजन, सम्वर्धन, के लिये जानी जाती है! औऱ बड़े-बड़े छलियों को गर्भ में पाल, उनको जगतोद्धार के लिये के वात्सल्य भी प्रदान करती हैं! लड़कियां देवी होती हैं,दिव्य होती है, माँ होती हैं,ये लड़कियां! और यदि तुम खुद को धूर्त,दुष्ट,मनबढ़ समझते हो, तो रक्तबीज को भी निगल जाएं ऐसी माँ होती हैं लड़कियां! "अहिंष्य"

कैवल्यकामी!

Image
यात्रा करते-करते अब इस बिंदु पर हूं कि यहाँ से मात्र एक क्षलाँग, और मुक्त! मोक्ष नगरी में गया! किन्तु नही ये क्षलाँग लगेगी नही,इतनी शीघ्रता नही करनी है,अभी तुम सब को यहाँ लाना है,सबके साथ क्षलाँग लगेगी! अब तुम्हे रोगों से मुक्ति देने हेतु अनन्त पुनरावृत्ति हो,फर्क नही पड़ता। किन्तु क्षलाँग तो तुम्हारे संग ही लगेगी। ये निश्चित है... देखते है तुम्हारे "मय" में कितना जोर है!

साथी..११

Image
मेरी इस अनन्त चेतन यात्रा में साथी,मात्र तुम ही नही हो; अपितु अंनत परिस्थितियों में अनन्त लोग हैं। किन्तु तुम भी हो,तुम भी हो उनमे से एक जिनके साथ मेरी चेतना पूर्ण प्रस्फुटित होती है। मेरे अनुमान में तुम ही हो जो मुझे अनन्त जन्मों से मुकम्मल करते आयी हो। ये साथ स्थूल रूप से तो द्वैत प्रतीत होता है,किन्तु है नही द्वैत। निश्चित उद्घोष है मेरा ये कि मैं परमात्मा के निकट पहुंचा बिना परिश्रम के,उसमे तुम्हारा निःस्वार्थ प्रेम सहायक हुआ। तुम मुझमे सांस लेती हो,और मैं तुममें समाहित हूँ.. अब हम अद्वैत हो गए.. मैं औऱ तुम इस जीवनरूपी रंगमंच के पात्र मात्र है.. कबतक कहां तक इन प्रश्नों से बहुत दूर.. जन्नत के सरोवर में एक नौका पे बैठे हम,चांदनी चमकती तारों वाली रात्रि में प्रेम के बहाव में बह रहे हैं! दूर शहर में लोगों में उपद्रव मचा हुआ है। शुक्र है कि हम दूर है सरोवर रूपी परमात्मा के आश्रय में अभय होकर।आधे तुम आधा मैं डोर कृष्ण की और पूरे हुए हम।
बहू ही बहुत है सम्भ्रांत जनों के लिए,.......... वरना दहेज से तो भिखमंगे पलते ही आ रहे हैं अहिंष्य

मातृ-बोध!

नमन-नमन हे मातृ नमन तुमको अर्पित है ये जीवन तुमसे ही हैं सारे उपवन नभ-जल-थल में तुम ही तुम। ये शीश तुम्हारे चरणों में गर अर्पित कर दे मेरी प्यारी फिर भी कर्ज रहेगा बाकी सहस्त्र जन्मो में भी माता तुमसे निर्वाण असम्भव है।। कण-कण अपना अर्पित करके निर्माण किया तुमने ये तन तुमही तो भारत माता हो जननी हो विश्वविधाता हो।। माँ हरपल तेरी गोद मे ही रहते तेरे पुत्र सभी हे माँ! हमसब वीर बने मानवता का उद्धार करे वन्दन है तुमको क्षण-प्रतिक्षण।। गर उठी किसी की आंख तुमपर सर-कलम तो उसका निश्चित है दुष्टों को निर्वासित कर ये राष्ट्र अमर हो,है ऐसा प्रण! नमन-नमन है मातु नमन.... अहिंष्य

अंत्येष्टि!

Image
मेरा जन्म १९९३ के नवंबर २८ को शनिवार की रात्रि और रविवार के भोर में ३ बजे हुए हुआ,कार्तिक की पूर्णिमा के दिन! जन्म से लगभग डेढ़ वर्ष तक मुझे कुछ भी स्मरण नही है,दीदी मुझसे १८ महीने की बड़ी है! अतः हमदोनों साथ-साथ स्तनपान करते थे,एक बार मैं गुस्से में दीदी को दांत से काट लिया दीदी पिता जी के साथ चली गयी! उस वक़्त मैं कोई बीस महीने का रहा होऊँगा!... एक स्मृति जो मुझे अनवरत रहती थी वो ये की मुझे खुली आँखों से चिता जलना दिखाई देता था,और मुझे जोर का ज्वर हो जाता,जो माँ के वक्ष से लिपटे-लिपटे समाप्त भी हो जाता! अध्ययन में मुझे कोई रुचि नही थी,हाँ ४ वर्ष की उम्र तक मैं सामाजिक हो चुका था,उस वक़्त मेरा बैल मेरा प्रिय सखा था! और दो चार कुत्ते! सर्प को छोड़ मुझे सारे जानवर प्रिय थे,सर्प से भी भय नही लगता लेकिन उसकी चिकनी त्वचा मुझे अजीब लगती थी! दादी की सारी कहानियां मुझे स्मरण है,बड़की माई भी कहानी सुनाया करती थी! विद्यालय जाना मुझे प्रिय था,किन्तु पढ़ाई अपने हिसाब से ही करता था! मेरे यहाँ हरवाह हैं पलटु दादा! उनको मैं दादा ही कहता था! जब वो बैल लेकर खेत जाते तो उनके साथ मैं भी जाता,और सारी ...

मेरे बाद!

Image
सम्भव है कि मेरे होने तक ही,अन्यथा मेरे बाद तुम भी मेरे जैसे ही हो जाओगे! मैं तुम्हारे अन्तस् में हूँ तुम बस आँखे बंद नही किये नही तो मिल जाते मुझसे! और मैं यूँही नही तुम्हारे पास आता हूं,तुम्हे ज्ञात हो या न हो किन्तु तुम्हारे अन्तस् की पुकार पर ही मैं तुम्हारे समक्ष होता हूँ! मेरा कोई स्वार्थ नही है अपितु मैं तुम्हारे स्व-अर्थ को जागृति देने हेतु ही आता हूँ! मेरे जाने के बाद भी मैं रहूंगा,तुम्हारे साथ! तुम्हारे प्रत्येक अवस्था में!

प्रेयसी तो तुम ही हो न!

Image
मोहब्बत कुछ इस तरह है तुमसे मेरी! कि पहली नजर में ही मैं परिवर्तित हो गया यूँ तो अब मुझे सबमे खुदा दिखते हैं।। किन्तु श्रेय तो तुम्हे है कि जबसे तुम्हे देखा,पहली दफा ही कुछ कहा भी नही तुमसे कभी कभी भरी नज़र से देखा भी नही तुम्हे किन्तु श्रेय तुम्ही को है कि तबसे कण-कण-कृष्ण क्षण कृष्ण, हे देवी हे दिव्य! प्रारंभ तुमसे ही हुआ नही तो घमण्ड अकड़ इत्यादि दुर्गुण थे मुझमे जो प्रतिपल विलीन हुए श्रेय तो तुम्हे है! प्रेरक तुम्ही रही मैं कभी बन्धन नही बांधना चाहा किन्तु श्रेय तो तुम्ही को है! जब भी तुम स्मृति-समक्ष होती हो मैं तुम्हे भेजने के लिये कृष्ण को धन्यवाद दे देता हूं! मैं बन्धन में तो नही हूँ किन्तु निःबन्ध भी तो तुमसे ही हुआ तुम्हे देखने से हुआ! श्रेय तो तुम ही हो! कि समस्त भय विसर्जित हो गया,श्रेय तो तुम्हे ही है कि कितने भी खूंखार लोग हो या जानवर भी मुझसे प्रेम से लिपट जाते हैं मैं सबके काम आ पाता हूँ निःस्वार्थ श्रेय तो तुम ही हो! मैं धरती का बोझ नही रहा धरा भी मेरी माँ हो गयी श्रेय तो तुम ही हो! मुझे बस वही मिला न मिलन-न जुदाई एक महामिलन! ज...

काला रंग!

Image
रंगों में मैं काला रंग हूँ काजल समझो या कलंक लग जाऊंगा छुड़ाना मुश्किल।। लग जाऊं तो छुड़ाना मुश्किल! मुझे कौन सा रंग लगाओगे मैं तो काला रंग हूँ सारे रंग समाहित मुझमे रंगों में मैं काला रंग हूँ। लग जाऊं फिर छूटे ना! मत पढ़ना मुझको तुम प्यारे रंग चढाता हूँ मैं ऐसा, पहचान बदल जाएगी तुम्हारी बच कर रहना मुझसे हमेशा पहचान मिटा दूंगा तुम्हारी।। दुनिया परिवर्तित कर दूंगा तुम्हारी रंगों में मैं काला रंग हूँ सटे मुझसे की गयी तुम्हारी बनी बनाई पहचान... मिट जाओगे तुम मत पढ़ना मुझको!।।

एक खत उन्हे भी!

Image
ये लेख मैं उनको सपर्पित कर रहा हूँ जिनका श्रेय अत्यधिक है मेरे होने मे! कभी-कभी जानकर कभी-कभी अनजान बनकर मैंने जिन लोगों को प्रताड़ित किया और प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझे स्नेह के अतिरिक्त, दुआओं के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिया! वो प्रताड़ना मैं महसूस करता हूं कि कितनी पीड़ादायक रही होगी,उसका प्रतिफल तो मुझे मिला ही और शेष भी मिलेगा किन्तु उनलोगों के स्नेहवत व्यवहार ने मुझे बहुत कुछ सिखाया! करुणा, दया,प्रेम,सौहार्द, सामंजस्य, क्षमा, दानशीलता इत्यादि मानवीय मूल्यों का जो भी अंश कालांतर में विकसित हुआ,निश्चित ही ये उन्ही लोगों की देन है। और उस प्रत्येक शख्स को मैं आभार करता हूँ,उनके चरणों की वंदना करता हूँ। देर अबेर मेरा ये लघु-लेख उनतक पहुंचेगा, मैं धन्य हूँ, मैं धन्यवाद भी देता हूँ योगेश्वर को, कि इतनी भारी-भारी त्रुटियो के बाद भी मुझे जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो रही है। लेख का समापन एक मशहूर कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से- अब सबसे पूछता हूँ बताओ तो कौन था, वो बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जिया।

सांस में तुम!

Image
हा तुम्हारी याद में मैं निर्जन जगहों पर जाकर उनको खुद से सम्बंधित करता हूँ। रोने देता हूँ खुद को बहने देता हूँ तुमको अवरुद्ध नही करता तुमको खुद में जीने देता हूँ तुमको। कहां विरह, कैसी विरह एक क्षण भी अलग हुए अगर तब न है विरह, तुम सांस-सांस चलते हो,मुझमे रहते, हो बिखरते हो, सिमटते हो।। तुम अद्भुत अनुभूति हो प्राणों की आहुति हो जीवन को जीवट कर के प्रतिपल सहते रहते हैं,और कुछ कहते रहते हैं।। नियंत्रण है क्या किसी का  एक कण पर भी,यहाँ तो सब सतरंज के मोहरे हैं जिसका नियंता सारी चालें चलता कभी गम भी देता है,कभी खुश भी कर देता और कभी जीवन ही ले लेता।। फिर कैसे करूँ दोषारोपण खुद पर या तुम पर या नियति पर बस नही मेरा उसपर हाँ तुम्हे सांसों में जीने का हक़ है मुझे और उससे किसी को कोई कष्ट भी नही होगा।।