अंत्येष्टि!

मेरा जन्म १९९३ के नवंबर २८ को शनिवार की रात्रि और रविवार के भोर में ३ बजे हुए हुआ,कार्तिक की पूर्णिमा के दिन!
जन्म से लगभग डेढ़ वर्ष तक मुझे कुछ भी स्मरण नही है,दीदी मुझसे १८ महीने की बड़ी है! अतः हमदोनों साथ-साथ स्तनपान करते थे,एक बार मैं गुस्से में दीदी को दांत से काट लिया दीदी पिता जी के साथ चली गयी!
उस वक़्त मैं कोई बीस महीने का रहा होऊँगा!...
एक स्मृति जो मुझे अनवरत रहती थी वो ये की मुझे खुली आँखों से चिता जलना दिखाई देता था,और मुझे जोर का ज्वर हो जाता,जो माँ के वक्ष से लिपटे-लिपटे समाप्त भी हो जाता!

अध्ययन में मुझे कोई रुचि नही थी,हाँ ४ वर्ष की उम्र तक मैं सामाजिक हो चुका था,उस वक़्त मेरा बैल मेरा प्रिय सखा था!
और दो चार कुत्ते! सर्प को छोड़ मुझे सारे जानवर प्रिय थे,सर्प से भी भय नही लगता लेकिन उसकी चिकनी त्वचा मुझे अजीब लगती थी!
दादी की सारी कहानियां मुझे स्मरण है,बड़की माई भी कहानी सुनाया करती थी! विद्यालय जाना मुझे प्रिय था,किन्तु पढ़ाई अपने हिसाब से ही करता था!
मेरे यहाँ हरवाह हैं पलटु दादा! उनको मैं दादा ही कहता था!
जब वो बैल लेकर खेत जाते तो उनके साथ मैं भी जाता,और सारी जुताई उनके साथ-साथ ही रहता!
गन्ना चूसता था,मटर के खेत मे बैठ मटर भी खाता और लगभग खेत मे रहना मुझे पसंद था!
रात में दादा खेतों की रखवारी करते तो मैं उनके साथ ही रहने की जिद करता लेकिन वो मानते नही थे।
इंजन से सिंचाई के समय लगभग ६-६ घण्टे नहाता था!
गांव में तीन पोखरे,एक तालाब और एक नदी है!
जिसमें स्नान करना मेरे लिए सबसे प्रिय कार्य था,औऱ मौका देख मैं खूब नहाता था।
मेरे पड़ोस में बाबा थे,जो मेरे घर के पीछे एक मड़ई में रहते थे,
वो सबको खूब गाली देते थे,किन्तु मुझे कभी नही,बल्कि मुझे अत्यधिक स्नेह करते थे, मैं जब भी जाता तो वो मुझसे मीर्च लाने को कहते थे,और मैं खूब सारी मिर्च उन्हें दे देता!
वो मुझे राजन कहते थे।
उस वक़्त मेरी आयु ६ वर्ष की थी,जब उनकी मृत्यु होने वाली थी,उनके मृत्यु के दो माह पूर्व से मेरी घनिष्ठता और बढ़ गयी थी,उनकी तबीयत बिगड़ी हुई थी,डॉक्टर कह दिए थे की उनकी मृत्यु होने वाली है! पहली बार मैं किसी को मरते हुए देख रहा था,उस दिन मंगलवार था,उनकी सांसे अंतिम गिनती पूर्ण कर रही थी,वो अचेतन अवस्था मे थे,एक हफ्ते से ही!
और सारे लोग घेरे हुए थे उन्हें,मैं एक चारा मसीन को पकड़ एकटक उन्हें मरते देख रहा था!
प्रातः ६ से ८ बजे तक देखता रहा और ८ बजे उनकी मृत्यु हो गयी!
उनके अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी,मैंने माँ से कहा की मुझे भी जाना है,किन्तु माँ ने नही जाने दिया!
मैं रोया नही था किन्तु मुझे मलाल था इस बात का की मुझे जाने क्यों नही दिया जा रहा है,उनके शव के साथ, उस वक़्त मुझे बच्चा होने को लेकर भगवान से शिकायत भाव भी उपजा।
उसके बाद जिसकी भी मृत्यु होती उसके अंत्येष्टि में मैं जरूर जाता,मैं विद्यालय का नियमित विद्यार्थी रहा हमेशा, किन्तु अंत्येष्टि के दिन मैं विद्यालय नही जाता और ८ वर्ष की उम्र से ही अबतक लगभग २५० अंत्येष्टि में जा चुका हूँ।
मैं जलते देखता हूँ चिता को,बिल्कुल शून्य भाव से,वहाँ मुझे एक अखण्डता का बोध होता है।

Comments

आज बहुत शून्य और एकाकी मन से आपका पोस्ट पढ़ा । बेहतरीन ....
Prabhakar Dubey said…
धन्यवाद!अनुज

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