उर्वशी!
मुझमें और तुझमें
एक रिश्ता तो है..
कि जब मैं डूबता हूँ
इश्क़ में तुम्हारे..
निर्जन रातों में
मेरे श्वांसों की ध्वनियाँ,
सुगंध तुम्हारी रग-रग में
मेरे! प्रिय! इस कदर..
समहित होती हैं...
मुझमें तुममे अभेद सम्बंध
निर्जन रैन, रंग बरसावे
तेरे संग हे मेरे प्रिय!
स्पर्श तुम्हारा मेरे पाषाण-हृदय
को पिघला-पिघला के
पारस बनाता जाता..
चुम्बन तुम्हारा,आहिस्ता-आहिस्ता
मय को विलीन करता कृष्ण में
एक-एक बूंद प्रेम की यूँ स्पर्श करती
हमें प्रिय! मैं सन्यस्त होता जाता!
बर्फ के हैं ये स्वर्णिम पल
कि पिघल-पिघल के मेघ
निर्मित कर जाते!
और अब एक बारिश होगी
जो विश्व की समस्त लकीरों
को मिटा देगी!
एक विश्व,एक धर्म का उदय
हो रहा है!
एक धर्म जो निर्ग्रन्थ होगा
सहज होगा!
पूरा विश्व एक परिवार हो गया।
मुझमे और तुममे एक
रिश्ता तो है
जो दिखता ही दिखता है
पर दिखता नही!
बस रैना आये...
ले जाये मुझको
तेरी ओर,उस छोर
उड़कर, उछलकर, तैरकर
बस रैना आये ले जाये मुझको
मुझी से दूर...
कर दे रिहा मुझे मुझसे ही...
तुम्हारा चुम्बन हहहह!
प्रिय! मुझमे और तुझमे
एक रिश्ता तो है!
एक रिश्ता तो है..
कि जब मैं डूबता हूँ
इश्क़ में तुम्हारे..
निर्जन रातों में
मेरे श्वांसों की ध्वनियाँ,
सुगंध तुम्हारी रग-रग में
मेरे! प्रिय! इस कदर..
समहित होती हैं...
मुझमें तुममे अभेद सम्बंध
निर्जन रैन, रंग बरसावे
तेरे संग हे मेरे प्रिय!
स्पर्श तुम्हारा मेरे पाषाण-हृदय
को पिघला-पिघला के
पारस बनाता जाता..
चुम्बन तुम्हारा,आहिस्ता-आहिस्ता
मय को विलीन करता कृष्ण में
एक-एक बूंद प्रेम की यूँ स्पर्श करती
हमें प्रिय! मैं सन्यस्त होता जाता!
बर्फ के हैं ये स्वर्णिम पल
कि पिघल-पिघल के मेघ
निर्मित कर जाते!
और अब एक बारिश होगी
जो विश्व की समस्त लकीरों
को मिटा देगी!
एक विश्व,एक धर्म का उदय
हो रहा है!
एक धर्म जो निर्ग्रन्थ होगा
सहज होगा!
पूरा विश्व एक परिवार हो गया।
मुझमे और तुममे एक
रिश्ता तो है
जो दिखता ही दिखता है
पर दिखता नही!
बस रैना आये...
ले जाये मुझको
तेरी ओर,उस छोर
उड़कर, उछलकर, तैरकर
बस रैना आये ले जाये मुझको
मुझी से दूर...
कर दे रिहा मुझे मुझसे ही...
तुम्हारा चुम्बन हहहह!
प्रिय! मुझमे और तुझमे
एक रिश्ता तो है!

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