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Showing posts from 2020

महाकाल!

सुनो पतीत प्रताणित प्राणी! एक बात तुम्हें बताता हूँ... तुम विनय नही तजना चाहे कुछ हो जाये.... गर प्राणों में हो हलचल शस्त्रों का आकर्षण मनभाये... फिर भी हे प्यारे बन्धु तुम शस्त्रत्याग नित-नित करना... हाँ हृदयविहंगम ज्वारों को  करबद्ध उबलने तुम देना... कोशिश कर ज्वारों को तुम तरल-प्रवाह में ले आना... गगन को देखना तुम तरल को देखना तुम क्रोधग्नि को शीतल करना तुम आहिस्ता-आहिस्ता एक क्षण आएगा... गगन भी अश्रुजल बरसाएगा तमस को शीतल कर जाएगा और हाँ एक दिन एकांत में रूदन होगा दुर्दांत... उसे बस बह जाने देना... गगन से कह जाने देना! और इस मंत्रजप को बारम्बार होने देना निर्णय वक़्त को करने देना तुम बस मौन ही रहना... देखना तुम,चमत्कार होगा पीड़क का विनाश होगा! अस्तित्व भस्मीभूत होगा औऱ तुम्हे ज़रूर दिखेगा वक़्त का न्याय, अन्याय के विरुद्ध! अन्याय के विरुद्ध काल के विहंगम रूप को  देखने का अवसर जरूर आएगा! जरूर आएगा! अध्यापक प्रभाकर!

पुकार एक शृंखला!

हे महामानव! जब-कभी तुम्हारा ह्रदय नेक कार्य करने के लिये स्पंदित हो, पहले तो उस स्पंदन की गति को साक्षी भाव से देखना! किसी से भी सहयोग के लिये मत कहना, नही तो तमाशा बन जाओगे! चुपचाप उसकी तीव्रता को अपने रोम-रोम में संचरित होने देना! और अकेले अपने पथ पर साधित कदम रखना! अपने अनुभव से सीखना! एक दिन ऐसा आएगा जब ये जमाना कदमताल करेगा तुम्हारे साथ! और वो दिन जरूर आएगा! सादर! अध्यापक प्रभाकर

अंत्योदय!

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी का दर्शन है! समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय या किसी भी सामाजिक सेवा का लाभ समाज का अंतिम व्यक्ति भी उतना ही पाए जितना प्रथम व्यक्ति! मेरे विचार से यदि तंत्र को पवित्र किया जाए तो पण्डित जी के विचार स्वतः लागू हो जायेंगे! एवं तंत्र के शुद्धिकरण के लिये शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों महती भूमिका निभाते हैं! शिक्षा से शिक्षक एवं शिक्षार्थी तथा चिकित्सा से चिकित्सक एवं रोगी सम्बंधित हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों मात्र प्रत्यय है स्थूल रूप से इन्हें विशाल बनाने वाले आधारस्तम्भ तो व्यक्ति ही है! व्यक्ति रोगी,शिक्षार्थी,चिकित्सक एवं शिक्षक या अन्य कोई भी हो सकता है। जिस समाज को उन्नति करनी है उसे सर्वप्रथम अपने शिक्षक और चिकित्सक को सर्वाधिक आदर देना चाहिए जिससे उनका उत्साहवर्धन होता रहे। कृषक का उल्लेख नही किया मैंने उसका कारण है कृषक बहुत महान होता है किंतु उसके पाल्यों को यदि शिक्षा नही मिली तो उसकी आने वाली पीढ़ी गुलाम होगी ये निश्चित है जो उसके लिये दुर्भाग्यपूर्ण होगा। किसान,शिक्षक एवं चिकित्सक यदि ये तीन ही समाज के प्रमुख रहेंगे तो समाज को पूरा विश्व आत्मसात क...

दर्पण

जाओ इस जगत से धरा से जुड़कर देखो आकाश.. तारे टिमटिमाते हुए दिखेंगे परन्तु ये टिमटिमाते हुए दिखने वाले तारे तुम्हारे नयनों की क्षमता के नाते हैं,असल में ये बहुत शक्तिशाली तेज से भरे हैं! ठीक तुम्हारा भी यही हाल है बेकार में बेहाल है अरे अपने अन्तस् के अंतर्गत दूर के तारे के करीब तो जाओ तब तुम जानोगे खुद की ऊर्जा को उमंग को तरंग को।। गिड़गिड़ाने से तुम्हें कुछ नही मिलेगा पहचानों खुद को,जानो तब मानो पथ पे चलो,पथिक नही योद्धा बनकर घृणा, द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध,विषय, वासना से होशपूर्वक पार तो हो जाओ तुम्हारा कल्याण होगा जगतकल्याण होगा।। जाओ छोड़ो जानो मानो! अपनाओ इस नूतन पथ को! सादर प्रभाकर!

हंसिनी!

मैं अपने पुत्र को लेकर छत पर सो रहा था ज्येष्ठ की रात्रि में,तुम अजनबी थी, मेरे लिए एवं मैं भी तुम्हारे लिये, मैं सोता नही हूँ कभी भी,हाँ विश्राम करता हुँ, तुम्हारा आना तुम्हारा चद्दर उठा कर मच्छर से बचाने के लिये मुझे एवं पुत्र को ढककर फिर वहां से हट जाना! मैं मौन देखता रहा हे हंसिनी तुमको और अचानक एक तरंग उठी मेरे अंदर,मैं परिचित हुआ उसी क्षण आपसे! हे हंसिनी तुम महाश्वेता हो!
जो तुमको संकर्षण से द्विज रूप दिलाये,खुद को वो अपनी कठिन डगर के कुछ हालात कहो, कुछ बात कहो!

३३अंक!

ये बात २०१४ अप्रैल की है;मैं परीक्षा दे रहा था, स्नातक तृतीय वर्ष का;समाजशास्त्र का। परीक्षा कक्ष में बैठा था मैं,मैं अंग्रेजी भाषा में लिख रहा था १३ मिनट हुए थे परीक्षा कक्ष में लिखते हुए... तभी अचानक मुझे मेरे एक मित्र की कही हुई बात याद आई! "प्रभाकर! तुम १००/१०० बहुत बार पाए हो; कभी परीक्षा में ३३ अंक,जो न्यूनतम अंक है उत्तीर्ण होने के लिये,पाओ बस इतना ही लिखना परीक्षा में।" तभी मेरे एक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ आर के यादव, कक्ष निरीक्षण के दौरान मुझसे पूछे,"प्रभाकर क्या हाल है?" मैंने उत्तर दिया," ठीक हूँ सर!" वो आगे बढ़े,२ कदम बढ़े होंगे कि मैंने उन्हें बुलाया,"सर! सुनिये!" वो बोले,"हाँ, कहो! क्या है।" मैंने कहा उनसे,"सर ज़रा देखिये,ये जितना लिखा हूँ,३३अंक मिल जाएंगे इससे १००अंक में!" उन्होंने देखा और कहा "हाँ मिल जाएगा!" मैं तत्क्षण उन्हें अपनी उत्तर पुस्तिका दे दिया! "सर हो गया,जमा कर लीजिए.." ये राजीव गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय जगदीशपुर अमेठी की घटना है! ....जारी रहेगा....

भगवान के वचन!

मैं तुम्हें एक जीवन के गहरे कानूनों में से एक बताता हूं। तुमने इसके बारे में बिल्कुल नहीं सोचा होगा। तुमने सुना होगा  और पूरा विज्ञान इस पर निर्भर करता है कि कारण और परिणाम आधारभूत नियम है। तुम कारण निर्मित करो और परिणाम अनुसरण करता है। जीवन एक कारण-कार्य कड़ी है। तुमने मिट्टी में बीज डाल दिया है और वह अंकुरित होगा। अगर कारण है, तो वृक्ष पीछे चले आएंगे। आग है: तुम उसमें अपना हाथ डालोगे तो जल जाएगा। कारण है तो परिणाम अनुसरण करेंगे। तुम ज़हर लो और तुम मर जाओगे। तुम कारण की व्यवस्था करो और तब परिणाम घटित होता है। यह एक सबसे बुनियादी वैज्ञानिक कानूनों में से एक है, कि कारण और परिणाम जीवन के सभी प्रक्रियाओं की अंतरतम कड़ी है। मान लो एक ऐसी स्थिति बनी है जिसमें तुम खुशी से भर गए हो। एक दोस्त आ गया है, या प्रेमिका का संदेसा आया है। एक स्थिति कारण बनी है – तुम खुश हो। खुशी परिणाम है। प्रेमी कारण बना है। धर्म कहता है: खुश रहो तो प्रेमी आता है। परिणाम पैदा करो और कारण पीछे चला आता है। मैं तुम्हें राज्यों के बिना राजा बना सकता हूं , तुम सिर्फ राजाओं की तरह अभिनय करो, और इतनी समग्रता स...

शराब!

ये भी एक प्यास ही है मेरी कि जीवन-जगत से दूर रहूँ पहचान ही न हो कोई... आरम्भ से प्रारंभ करूँ... किन्तु ये विशेष नही बस एक कीमिया है जो परिवर्तित हुई है मध्यम हो जाना ही विकल्प बचा.. सूत्र पकड़ने के लिये... और जैसे ही मध्यम का ज्ञान होगा... चक्रण से मुक्ति मिलेगी किंतु इस मुक्ति की आसक्ति न होना जरूरी है! आँख मुंदने के पहले आंख मूंदे अगर स्वतः तो क्रांति सम्भव है