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Showing posts from January, 2018

साथी..6

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कैसे मिला ये साथ, उद्घोष जटिल है सरल नही! किन्तु तुम्हारा प्रिय मिलन ये, महामिलन का हेतु प्रिये! यूँ तो एक दायरे में ये, साथ नही बंधता, साथी! न ऐसी कोई ईप्सा भी.. फिर भी हर बार हे! प्राण प्रिये! रोम-रोम अनुग्रह से भर जाता है,इस अद्भुत अनुग्रह को स्वीकार करो, ये तुमसे ही है! अद्भुत रहस्य एक ये भी है हर पुरूष प्रेयसी में, माँ को ही ढूंढता है, साथी तुम इसमे भी अव्वल! कर दिए दिप को, प्रज्वलित! दिशा बदली वासना ने! दृष्टि बदली आत्मा ने! माफ कर पाता हूँ मैं, सब पाप तुमसे मिलकर, क्रोध सारे ताप सारे, प्रेम परिवर्तित हुए! ये साथ बहुत ही दिव्य सखी ये बन्धन का मोहताज नही! इतनी गहरी "अनुभूति" ये अधिकारों के पथ-पार रही! मैं तुच्छ कटोरा लिये खड़ा एक भिक्षुक ही तो था पहले, तुमने इतना विश्वास दिया, और दानवीर का मान दिया! योगेश्वर के और, निकट होने का भान दिया! नमन मुझे इस "साथ" को है, और साथी के बलिदान को है।।

अर्जी मंजूरी!

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आप कृपासिंधु है, आपके कार्यशैली का जवाब नही आप को कोटि कोटि प्रणाम! अर्जी दिया था आपको मंज़ूर कर लिए गोविंद उसके लिये आपको धन्यवाद! कोटि कोटि धन्यवाद!

मैं, तुम औऱ वो!

"संतुलन,कौन बनाएगा सन्तुलन, मैं, तुम की वो...मुझे लगता है कि कुछ दूर तक मैं,फिर जब मैं मुझसे ही हार जाता हूँ तो तुम और जब मैं और तुम दोनों के दायरे से बाहर आ जाती है बात तो वो..." यहीं इसी बिंदु से पूरे विश्व का संतुलन स्पष्ट होता है,पश्चिम मैं!  मैं प्रधान रहा प्रारंभ से ही एवं पूर्व  "वो" प्रधान रहा है प्रारंभ से फलतः अनुसंधान और सन्देह पश्चिम की देन रहा है एवं श्रद्धा और अंधविश्वास पूर्व में प्रचलित रहा... इसमे ध्यातव्य है कि "तुम" पश्चिम एवं पूर्व दोनो जगह मध्य में ही है... और जिस दिन हम सम्यक "तुम" का अनुसन्धान करके सबको मर्म सीखा दिए,प्रचारित कर दिए उस दिन समग्र सृष्टि सम्यक सन्तुलित हो जाएगी।

घृणा!

मेरे जीवन का अबतक का एक अनूठा प्रयोग है ये कि जिस-जिस तथ्य,व्यक्तित्व या किसी अन्य वस्तु से मैंने घृणा किया, कालांतर में उसी तथ्य,व्यक्तित्व,और वस्तु को अपने अंदर समाहित पाय...

महिमा नरायण की!

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कैसे न कह दूं मैं, सब कुछ दिया तूने, जो भी जब भी मांगा, सब कुछ दिया तूने!।। भर गए नैन मेरे , जब जब तुम याद आये, हे! नाथ तुम मेरे, हर अंश में दिखते हो।।। इतना अनुग्रह है , कि सागर भर जाये, ...

एक कदम!

रोचकता; बहुत आवश्यक प्रत्यय है ये किसी भी कार्य के बेहतरीन परिणाम के लिये.. रोचकता यदि आपके दृष्टिकोण में उपस्थित है तो आपकी कार्यशैली उत्तम परिणामों का सृजन कर पायेगी। अब प्रश्न ये है कि रोचकता उत्पन्न कैसे किया जाये?या रोचकता को ज्यादा देर तक अपने कार्यशैली में जीवित कैसे रखा जाए?इत्यादि। अब मैं इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूंगा.. 1-कार्य का चुनाव! सर्वप्रथम तो हम उन कार्यों को चुने जिनमे हमारी रुचि वास्तविक रूप से हो,और हां ये बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है,अर्थात इस प्रक्रिया में आप स्वयं के अतिरिक्त किसी का भी सहारा न लें;इस प्रक्रिया में थोड़ा वक्त लगता है,और लगेगा तो इसमें जरा-सा भी घबराने की आवश्यकता नही है और जब हम अपने मनोनुकूल कार्य को चुन लेते है तब हमें दूसरे चरणों की आवश्यकता है। 2-सम्यक आत्मनिवेश.. ये एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य या प्रक्रिया है,क्योंकि इस प्रक्रिया में महारथ हासिल करने के बाद आप अपने लक्ष्य प्राप्ति की 90% उम्मीदवारी अर्जित कर लेते हैं। इसका मूल उद्देश्य ये है कि आप अपने कार्य मे डूबने का अतिरेक न करें,और बिल्कुल सन्तुलित ढंग से अपने कार्य ...

रूदन( The beauty of weeping)

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रूदन बहुत सुंदर प्रक्रिया है,सारे घाव भरने के,लेकिन शर्त ये है कि रूदन पूर्ण मनोयोग से होना चाहिए। इस समग्र सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति समस्याओं से ग्रस्त है,विभिन्न प्रकार की समस्याएं है। और निःसंदेह प्रत्येक समस्याओं का समाधान भी,इसलिए हमें समस्याओं एवं उनके समाधान से स्वयं की आत्मा को चोटिल नही करना चाहिए क्योंकि एक तथ्य निश्चित है कि समस्याओ का कभी अंत नही है अर्थात समस्याओं की एक उत्तरोतर सृंखला है। हमे आवश्यकता है कि हम अपनी आत्मा को स्वस्थ रखे उसके लिए हमे सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा,और ये दृष्टिकोण अभ्यास से उत्तम होता जाता है,और जैसे जैसे दृष्टिकोण परिमार्जित होता जाता है हमारा चित्त भार मुक्त होता जाता है,वर्षों की ग्रन्थियां आहिस्ता-आहिस्ता मुक्त होती जाती हैं। और धीरे-धीरे हम आध्यत्मिक आयामों की सुंदर यात्रा पर निकलना प्रारम्भ कर देते है;इस यात्रा से हमारा व्यक्तित्व विशद होता जाता है,हमें ज्ञात होता है कि हम इस समग्र व्यवस्था के एक अंग है,पहली दफा हमें हमारी जाति का स्मरण होता है और इस स्मरण होने के पश्चात हम विभिन्न सांसारिक सीमाओं में रहकर भी उनसे मुक्त रहते है...

पुकार..2

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खुशी की शर्त बस यही है, बाटने से ही मिलती है।। कमी हो,या हो आधिक्य, ये ऐसा मर्म जान लो तुम। कोई रह न जाये भूखा, कुछ ऐसा कर्म जान लो तुम।। जरा निकलो घरौंदों से, बुलाता तुमको भारत ह...

साथी..5

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कैसे लिखू सारी बातें, इतने सघन वो एहसास जो, साथ तुम्हारे होने से मुझपर गुजरे, यूँ मुक्त हुआ भारो से मैं।। किन्तु अब क्या होगा हृदय से भाव सारे बह रहे, जैसे संगम के बाद बहती है ग...

साथी..4

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तुमसे सीखा निर्मल होना, और क्षमादान का महात्म्य कुटुम्ब में प्रेम का भाव, और प्रेम में भी होता है त्याग! माँ से स्नेह,पिता से दुलार औऱ निज का सम्मान, हर क्षण प्रेम में डूब कर, कैसे सहते है अपकार! योगेश्वर का प्रतिरूप हो तुम, हर मार्ग प्रदर्शित करते हो, जब जब कठिनाई आती है! निःस्वार्थ समर्पित रहते हो।। मेरे हर ख्वाहिश का प्यारे, कितना ख्याल तुम करते हो! मैं गर विचलित होता मानवता से! उस वक़्त गुरु स्तम्भ बने तुम! ये साथ बहुत ही पावन है, सच कहूं तो एक इबादत है, पूर्ण जागरण होता है! ये साथ बड़ा मनभावन है।। तुमसे सीखा है अखण्डता, त्याग की सारी महानता, कि पाना ही सब कुछ न होकर, खोना भी प्रेम समर्पण है! कितना मधुर हुआ हूँ मैं तुमसे मिलकर प्यारे साथी! सारे झंझावत त्याग के मैं मानव कि सेवा सुश्रुषा में! कर दूं समर्पित जीवन ये, सच्ची श्रद्धांजलि प्रेम की मैं तुमको तब दे पाऊंगा, मीत! हे नाथ मुझे तुम सम्बल दो व्यवहार और आचरण से मैं एक उपहार दे पाऊँ! साथी के महत्व को! स्वर्णाक्षर से संसार लिखे! इतनी करुणा से भरो मुझे हे! नाथ ये मेरा निवेदन है.. अपकार कर...

साथी..3

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तेरे साथ जो भी बीता, वो वक़्त नही था,कुछ भी हो! मैं डूबा था भवसागर में, तुम अन्तस् की गहराई में।। प्रकृति का स्वागत देखो! टिप-टिप बरसाकर प्रेमाश्रु! दो मन,दो तन के मिलन को! शास्वत करने का प्रण लेकर।। उस अनुपम समय जो बीता प्रिये! वो वक़्त नही था कुछ भी हो! साँसे मिलकर एक ही तो थी.... जो गीत निकले...अप्रत्याशित! हम एक हुए थे दो होकर.. दुनिया की रस्मे विस्मृत कर.. उत्तप्त हृदय को सिंचित कर... हे! नाथ!...अद्भुत आनन्द दिए! उस वक़्त हुए हम भार मुक्त, करुणा, प्रेम और श्रद्धा युक्त।। हे नाथ तुम्हे अनवरत नमन,, यूँ किये दीन पर महत करम।। है आज हृदय उद्घोष कर रहा.. जो दुख था..मेरा लोभ रहा.. सारे भावों को यूं पिया.. मानो संगम की सुधा थी वो.. इतने पावन प्रायोजन,,को निःशब्द नमन हे नाथ तुम्हे!!  "मैं" हुआ विसर्जित मेरा अब! हे नाथ मेरा उद्धार करो.. हर क्षण रहकर साथ मेरे.. हे नाथ मेरा उद्धार करो।।

पथ! भारत के!

बिगड़ गयी वो बात पुरानी, लिखो आज एक नयी कहानी, दोषारोपण छोड़ो अपनो पर, हम सब इस देश के वासी है।। आओ कुछ नए आयाम लिखे, भारत की दिव्य मिशाल लिखें, शिक्षा कि दिव्य धरोहर हम, आओ नूतन एहसास लिखें।। खोमचे वाले,चाय वाले फेरी वाले रिक्शेवाले ,ऑटो वाले,चाट वाले, फुलकी वाले.....और खेतों के सब कृषक मतवाले।। ये सब इस देश के अनुपम निधि के, एक एक अंशों को भरते हैं, अफसोस जरा सा मुझको है, जो पढ़े लिखे वो लूटते हैं।। जो भटक गए चेतनता से, उनको भरो मानवता से, है काम नही ये...सरल किन्तु यदि हो चित निर्मल।। सब कुछ यहाँ पर मुमकिन है, संकल्प यदि कर लिए... भरत! फिर विश्व विजय भी मुमकिन है... कर्म किये गर हम अनवरत।। छोड़ो मजहब की चादर को, और जातिगत दीवारों को, एक कुशल राष्ट निर्माण करो हे भारत! तुम आगाज़ करो! आगाज करो!

जागृति एक सृंखला!

कभी-कभी जब अकेले में होता हूँ न जाने कौन है जो मुझमे आ जाता है, किन्तु जो भी है वो,है बहुत मझा हुआ, वो मुझसे बात करता है,उस वक़्त मुझे द्वैत होने का भास होता है.... किन्तु और गहरे जाने पर अद्वैत का ज्ञान होता है! एक दिन मैं स्वयं से बात कर रहा था, "मुझे तुमसे इतने हमदर्दी क्यों हैं? मेरा तुमसे रिश्ता क्या है?क्या सम्बन्द्ध है मेरा तुमसे? क्यों तुम मेरे ख्यालों में रहते हो? और क्यों मैं अपने सारे ख्वाब तुम्हारे इर्द-गिर्द ही बुनता हूँ? क्यों, क्यों क्यों? इतने सारे सवाल "और सारे सवालों के जवाब मुझे यथेष्ट नही मिलते जिससे मैं सन्तुष्ट हो सकूँ। किन्तु मैं इन समस्त प्रक्रियाओं का तटस्थ साक्षी रहता हूँ और इस साक्षित्व का एक लाभ प्रतीत होता है की धीरे-धीरे ये सारे प्रश्न स्वतः जैसे आते है वैसे ही विसर्जित भी हो जाते है! और मैं फिर अपने मनवांछित कार्य मे लग जाता हूँ। एक बात है कि कुछ दिन के अभ्यास के बाद ये प्रक्रिया तुमसे ज्यादा हसीन लगने लगी,मैं देख सकता हूँ अपनी ऊर्जा का एक अज्ञात केंद्र से एक अन्य अज्ञात केंद्र की ओर बहाव! इस प्रक्रिया में उस वक़्त तुम्हारे ...

Love--the beginning..

एक बात स्पष्ट है कि ये तू-तू मैं-मैं प्रेम का स्वरूप नही, हां प्रारम्भ हो सकता है, क्योंकि ये एक बाहरी परिचय का रूप है, और ये आवश्यक है,बिना इसके ज्यादातर प्रेम प्रारंभ नही होते। किन्तु जब हम कुछ दूर चल पड़े तो बात बदलने लगती है, हम इशारों में ही बड़ी बड़ी बातें कर ले जाते है। और इसका सबसे गहनतम स्तर हमें तब प्राप्त होता है, जब हम बिन कुछ कहे समझने लगते है, और यही प्रेम का उच्चतम रुप है जहाँ मौन ही सम्वाद हो जाये! इसके बाद का स्तर है,प्रेम से परमात्मा का मिलन वस्तुतः प्रेम भी योग है! उस अनन्त परमात्मा से जुड़ने में प्रेम सहायक है,बिना प्रेमानुभूति के परमात्मा तक पहुंचना अत्यधिक कठिन है..... इसलिये तो प्रेम ही प्रस्फुटन है प्रेम ही जागरण है! प्रेम ही योग है! प्रेम ही प्रारंभ है।

तेरी-गलियाँ.. the street of love

मेरे इश्क़ की शुरुआत तुम्हारे गलियों से हुई, और तुम्हारे गलियों का प्रत्येक चक्कर मुझे मुझसे मिलाता है, मैं देर अबेर चोरी छिपके तुम्हारे गलियारों से गुजर लिया करता हूँ! और एक-एक क्षण जैसे-जैसे बीतता जा रहा हूँ मै तुम्हारे होने,न होने से दूर निकलता जा रहा हूँ; और तुम एक-एक क्षण मेरे अंदर गहराते जा रहे हो! मैं आज भी उन गलियों से गुजरता हूँ, क्योंकि जीने की ज़िद पैदा होती है वहाँ से गुजरने में मुझमे! मुझे पवित्र होने का मार्ग प्रदान करती है,वो गलियां। मुझमे जो तुम हो उससे बात कराती है वो गलियां, मैं गलीयों का बंजारा हुआ ये बात और हसीन थी! मसलन अब वो गलियां नही, एक मुकम्मल रास्ता है जो मुझे तुमसे अखण्ड करता है,और उसके लिए उस योगेश्वर को धन्यवाद! कोटि कोटि धन्यवाद!    न तुम्हे खोने का डर     न तुम्हे पाने की ख्वाहिशें,       तुम खिलौने नही हो रूह हो,          बस तुम्हे इश्क़ करने का हक़ है मुझे!             तुम्हे महसूस करने का हक़ है मुझे,              ...

पुकार!

तुम भारत देश को जानो मानवता को पहचानों बलिदानी है ये भूमि... तुम अन्तस् को पहचानो इस वक्त हमारा भारत यौवन शक्ति का सागर है विश्व तुम्ही को बुलाता नफरत का छोड़ो मातम नेतृत्व करो तुम जग का, लिख डालो एक इबारत!

पीकदान!

एक सज्जन व्यक्ति,और विद्वान व्यक्तित्व था उनका,आज भी ज्ञान की अलख जगा रहे होंगे जहां भी होंगे...उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, और वो भी ज़िन्दगी के विभिन्न आयामों एवं तत्व के भी विभिन पहलुओं की,मैं बात कर रहा हूँ अपने प्राचार्य डॉ सत्यकाम आर्य के बारे में! वो मुझे स्नेह करते थे,और मैं उनको श्रद्धा भरी दृष्टि से देखता था क्योंकि उनका व्यक्तित्व वाकई बहुत स्निग्ध एवं सौम्य था! एक बार मेरी उनसे चर्चा हो रही थी पान मसाला, गुटखा, सुर्ती इत्यादि से रंगे हर कार्यालयों के स्वच्छता के सन्दर्भ में... उन्होने मुझे एक मार्ग सुझाया जो मुझे समीचीन जान पड़ता है, उन्होंने कहा कि ये बुरी आदत है और आदत जाने में वक़्त लगता है एवं हम किसी के निजी जीवन मे ज्यादा हस्तक्षेप भी नही कर सकते क्योंकि सबको अपना जीवन जीने का अधिकार है;किन्तु एक कार्य हम कर सकते है जिससे इन उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाली गन्दगी से  बचा जा सकता है! हम लोगों को प्रेरित कर सकते है कि वो एक पीकदान लेकर चले और रोज शाम को सोते वक़्त उस पीकदान को स्वच्छ करलें, जिससे उनका शौक,आदत,या जो भी जो वो भी पूरा हो जाएगा और पब्लिक प्लेस भी स्वच...

संकल्प-साधना

सबसे पहले आपका स्वस्थ होना जरूरी है,ततपश्चात आपकी चेतना का परिमार्जन होना भी जरूरी है। ख्वाहिशें फिर जरूरी होती है, और ख्वाहिशों को पंख देने के लिए जरूरी है गहनता, जो आपके विचारों से,अभ्यास से,एवं सबसे आवश्यक धैर्य से प्रतिपूरित होती है! दूसरी बात,जब आप साधना में होते है,तो आपके संकल्प के आंकलन के लिए सृष्टि प्रतिपल आपको चुनौतियाँ देती रहती है,जिससे आपकी गहनता और समर्पण का भान उसे होता रहे। और फिर तीसरा चरण है संकल्प सिद्धि प्रारभ का,अर्थात आप अब अपने मेहनत का परिणाम पा रहे होते है.... और यही संकल्प-सिद्धि सूत्र है! धन्यवाद!

सन्देह और शक्ति

जहां जहां मैं व्यथित हूँ, या किसी को व्यथित कर रहा हूँ वहाँ-वहाँ मैं हूँ,और जहाँ-जहाँ शक्ति एवं सौंदर्य के साथ मैं अन्य की मदद कर रहा हूँ वहाँ वहाँ आप है। मुझमे इसमे सन्देह है कि मैं अत्यधिक सौम्य एवं सुंदरतम ढंग से लोगों की मदद कर ही पाऊँ! किन्तु मुझे आपके अस्तित्व और प्रक्रिया में असीम विश्वास है,कि आप प्रत्येक क्षण मेरे साथ है,और मुझमे स्थित हैं,औऱ मेरे प्रत्येक अनर्थ सूचक कार्यों को करने को आप अवरूद्ध करेंगे! और मेरा ये विश्वास ही मेरी शक्ति है,आप ही मेरी शक्ति है,सर्व समर्पण आपको,मेरे अंदर आप हमेशा रहे और अनुचित मार्ग पर मुझे न ले जाएं ये आपसे सदैव विनती है मेरी!  इसलिए मैंने जो भी पाप कर्म किये हो,और मेरे किसी भी कार्य से यदि किसी की आत्मा को ठेस पहुंचा हो तो वो मेरे अंदर स्थित तामसिक या लोभमय वृत्ति के कारण ही हुआ है और ऐसा मैं स्वीकार करते हूँ निःसन्देह! और चुकि मैं आप को अपने मे अवस्थित जनता हूँ, और समस्त सृष्टि में भी अतः मुझे ये भी विश्वास है कि मेरे द्वारा किये गए अपयशो में भी आपके संचालन प्रक्रिया का कोई हेतु होगा जो पूर्णतः समझ पाना मेरी सामर्थ्य में नही। इसलि...

क्षमादान(forgiveness)

जो लोग भी तनाव में है,या कुंठा में जीवनयापन कर रहे है उनके लिये ये लेख समर्पित कर रहा हूँ। प्रिय मित्र! तुम परेशान बहुत हो,तुममे कुछ शिकायतें है लोगों से,अपनी खुद की परिस्थितियों से,रिश्तों से,ज़िंदगी तुम्हारे मुताबिक नही चल रही है इससे,आदि आदि... मैं एक छोटी सी ध्यान पद्धति बता रहा हूँ इसको करो तुम प्रफुल्लित हो जाओगे! प्रसन्नता और आत्मविश्वास से सराबोर हो जाओगे ये मेरा वादा है... सबसे पहले एक आरामदायक स्थान चुनो जहाँ तुम्हे कोई भी डिस्टर्ब न करे,फिर आराम से लेट जाओ,और पूरे शरीर को ढीला छोड़ दो,5 मिनट तक खुद को जितना सहज कर सकते हो करो... उसके बाद अपने दोनों भृकुटियों के मध्य में अपने ध्यान को ले जाओ,और एक चीज का ख्याल रखो की इस प्रक्रिया में उस बिंदु पे दर्द न हो....अर्थात बिल्कुल सहज होकर...भृकुटि के मध्य में ध्यान ले जाकर... धीरे-धीरे अपनी समस्त शिकायत वाले मुद्दों को क्रमानुसार लाना है और साहस कर के उन समस्त घटनाओं के हेतु को क्षमा करते जाना है... और ये क्षमादान की प्रक्रिया तब तक चले जबतक शिकायतें खत्म न हो जाये... उसके बाद एक ऊर्जा का संचार होगा, फिर समस्त प्रकृति को अनु...

शौच!

शौच..अर्थात मल निरसन, ये बहुत महत्वपूर्ण शब्द है,शारिरिक स्तर पर भी और आत्मिक स्तर पर भी। जब हम भोजन ग्रहण करते तो हमारा पाचन तंत्र भोजन के महत्वपूर्ण अंशों को शरीर मे समाहित करके अपशिष्ट को निर्गत कर देता है,जो मल मूत्र के रूप में हम शौचालय में त्याग देते है,और इस दौरान ध्यान देने वाली बात ये है कि हममे से प्रत्येक को मल मूत्र से तनिक भी आसक्ति नही रहती। हम दुबारा उस निर्गत मल मूत्र की तरफ दृष्टि तक नही डालते और शरीर हल्की और स्फूर्त हो जाती है। अब मैं बात करूंगा आध्यत्मिक स्तर की,आध्यत्मिक शौच भी अत्यावश्यक है,क्योंकि इस शौच से हम अपने आत्मा ,और मनः चेतना को स्वच्छ और सुंदर बनाते है। इसके लिए हमने देवालय बनाये,देवालयों का मात्र इतना ही महत्व है,ईसाई कन्फेशन करते है! देवालय अर्थात ध्यान स्थलों का ये बहुत गुह्य महत्व है और हममे से कदाचित विरले लोग इस अर्थ से परिचित है! हम प्रत्येक पल संसार मे विभिन्न विचार और भाव ग्रहण करते है,और उन भावों के साथ हमारी चेतना भी वही कार्य करती है जो हमारा पाचन तंत्र भोजन के साथ करता है। इसलिए आवश्यक है कि हम दूसरे शौचालय का भी अर्थ समझें और ...

कुत्ते की हड्डी!

टट्टी-पेशाब सड़क पे ही करेंगे शहरो को गंदा रखना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, पड़ोसी की शक्ल देखना न उनको पसन्द है न उनके पड़ोसी को उनका, बेटे के विवाह में दहेज जरूर लेंगे,न मिलने पर बहुओं को जला तक देंगे, दोस्त, धर्म और हृदय जैसे अनेको शब्द उनके जुबान पर है,उसका मतलब रत्ती भर नही जानते, पत्नी,बहन,भाई, बाप,से कभी कभी बात होती है उनकी अगर वो पुरुष है तो उनको संसार की सारी महिलाओं को छेड़ने में कोई गुरेज नही,किन्तु यदि उनकी बहन,बेटी किसी पुरुष से प्रेम करले तो उनकी त्यौरियां चढ़ जाती है,मन मे उनके एक सैलाब उमड़ आता है, वो रिश्वत लेते है,और देते है कानून तो उनके पाकिट में रहता है,जब जी आया निकाल के चिट-चिट करके तोड़ लिया करते है, और मां बहन की गलियां उनके चेहरे के आभूषण है, ये लोग वो कुत्ते है,जिनको राजनेता एक सुखी हड्डी दे देता है और ये सुखी हड्डी कभी असहिष्णुता की होती है,कभी साम्प्रदायिक उन्माद,या जातीय भेदभाव का होती है,....आदि आदि ये कुत्ते अनवरत काल तक उस हड्डी को काटते है,ये कुत्ते इतने मूर्ख होते है कि इन्हें इतना भी मालूम नही कि वो अपने खून को पी रहे है,हड्डी के चक्कर मे! ...

साथी.

तुम्हारे साथ मैं था कुछ देर तक फिर तुम साथ हो लिये, और अब ये साथ अखण्ड है मैं भी तुम्हारे साथ हूँ हमेशा तुम्हे महसूस भी होता होगा, तुम्हारे साथ जो गुजरा मैं तुम्हारे साथ बिताए हुए क्षण क्षणिक नही है,इसमे मेरा कुछ भी नही सब तुम्हारा स्नेह,समर्पण, वात्सल्य और श्रृंगार भी, मुझे यूँ ही नही मिला, मेरे किसी जन्म के पुण्यकर्मों का प्रतिफल है ये, आशातीत तुम्हारा मिलन दिव्यता का ब्रह्मांड हमारा साथ,हमारी कृणाएँ, हमारे व्यक्तित्व को इतना सबल और सुंदर बनाएंगी जिसकी हमने कभी कल्पना नही की होगी, तुम्हे धन्यवाद,मेरे योगेश्वर को धन्यवाद, मैं उन समस्त अनुभूतियों को व्यक्त कर पाऊंगा! क्योंकि जो कुछ भी हुआ है वो कभी कभी किसे विरले के ही जीवन मे होता है है साथी तुम्हे धन्यवाद,कोटि कोटि धन्यवाद, "इतनी जल्दी ही ख्वाहिशें पूरी हुई, तो जिम्मेदारी देने के लिए" हम दोनो चाहे जहा हों हमे प्रेम और करुणा बाटना है इतना प्रेम इतना प्रेम की कोई नास्तिक,भक्त हो जाये, कोई अंगुलिमाल परिवर्तित हो जाये, कोई रत्नाकर ..कालिदास हो जाये! इतनी करुणा इतनी करुणा...

साथी!

बड़ी बड़ी उत्कंठायें, बहुत बड़े बड़े ख्वाब, ख्वाहिशों के फौलाद तुमसे मिलते ही, तुम्हारे स्पर्श मात्र से ही, पिघलने लगे और उनके पिघलने से, हृदय भी पिघला आंखे नम हुईं, मानों कोई बहुत बड़ा पापी गंगा स्नान कर के मुक्त हो जाये, बोझ हवाओं की ओर तुम्हारे ताप से रुख कर दिए, सुना था मैंने कि प्रेम बन्धन है अपने मानवीय स्तर पर, किन्तु सुंदरतम स्तर पे प्रेम निर्ग्रन्थ करता है.... एक एक गांठ प्रेम से,स्नेह से खोल देता है, वो सारे सुंदर और स्निग्ध एहसास तुम हो,तुम कहाँ हो,कैसे हो इसे मेरी रूह प्रतिपल महसूस करती है, लेकिन एक शिकायत है  "कृष्ण" तुमसे तुम मेरी अनुभूति को गूंगे का गुण क्यों बना दिये फिर भी प्यारे ये शिकायत,शिकायत न समझना दिल्लगी है,दिल्लगी! तुममे भी मैं हूँ,मुझमे भी तू हैं,,, मुझमे भी तूं है, मैं हूँ ही नही, गया जो भी था अब सिर्फ़ तुम हो तुम हो! तुम हो।

सौम्यता

जब से हम अपनी चेतना को समझते है,तबसे हमारे व्यक्तित्व में परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है,हमें ये एहसास होता है कि हम कोई यन्त्र नही बल्कि ब्रह्मांड के दिव्यता का एक अंश हैं,धन संसाधन, औऱ विभिन्न भौतिक संग्रह मात्र साधन हैं जीवनयापन के। और फिर पहली दफा हम प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या,द्वेष,और विभिन्न षडयंत्रो से अपनी चेतना के विस्तार को वापस खींचते है,और उत्सव, प्रेम,और तात्विक तथ्यों की तरफ अग्रसर होते है। हमे तब ये विधेय ज्ञात होता है कि हम सब रंगमंच के अभिनेता है और हम एक स्रोत के अलग अलग भाग है,और अन्तिम में हमे उसी स्रोत में ही मिल जाना है। और फिर हम सौम्यत, स्निग्धता और करुणा का स्पर्श कर पाते है,और हमारा व्यक्तित्व विभिन्न सुगन्धों और दिव्य आभूषणों से युक्त हो जाता है। हममे तब कोई भी शिकायत शेष नही रह जाती अपितु हम प्रतिपल अनुग्रह से परिपूर्ण हो जाते हैं,और प्रकृति का कलरव हम सुन पाते हैं; और तब हमें एक तड़प भी होती है कि हम सबको नींद से जागॄत करें,क्योंकि हमें ये ज्ञात हो जाता है कि मूर्छा ही समस्त पीड़ाओं का हेतु है। हमारे चेहरे एक विशिष्ट आभा से युक्त हो जाते है जो बहुत सहज ही हमार...

चरित्रहीन!

मैं समझता हूं कि चरित्रहीनता को हम समझ नही सके,आमतौर पर हम चरित्रहीन होने को यौनसम्पर्क से सम्बंधित कर देते है;किन्तु ये बिल्कुल गलत अवधारणा रही है हमारी.. चरित्र शब्द का बिल्कुल दोहन है ऐसे उद्धरण, क्योंकि चरित्रहीनता कभी भी सेक्स से परिभाषित नही हो सकती,ये बड़ी भूल हो गयी हमसे अबतक। चरित्र का का सम्बन्ध दया,करुणा,सम्वेदना,अहिंसा,सामाजिकता और प्रेम प्रदर्शन के आयामों से होना चाहिए.... जहां तक यौन सम्बन्ध और चरित्रहीनता के सम्बंध के विषय मे जो कुछ यथोचित निर्धारण हो वो योन अत्याचारों के सम्बंध में होना चाहिये.... इस तरह की मान्यताओं से हम शक्ति सम्पन्न एवं सुंदर चरित्र का सृजन कर सकते है,जो समाज और संसार को प्रेम एवं सौहार्द से भर सकते है,और समाज का एवं व्यक्तित्व का उर्द्धगमन कर सकते है।

मंगल सूत्र(the divine relationship)

हम सनातन परंपरा के एक एक शब्द के ऋणी है,इतने अद्भुत दिव्य शब्द हमे अन्यत्र नही मिलते,मुझे ये उद्घोषणा करने में असीमित तृप्ति मिल रही है,संस्कृत का एक शब्द "तत्वमसि" जो एक अद्भूत शब्द है,हमारी आध्यात्मिक चेतना का शिखर रूप प्रदर्शित करता है.... और स्त्रियों को देवी रूप में परिभाषित करने वाला एक विशद शब्द मंगलसूत्र जो हृदयस्पर्शी है... तुमसे कोई बाध्यता नही है,सन्तान उत्पन्न हो तो वो भी दिव्य,मंगल सूत्र से....जिसका साक्षी भी कौन है,सम्पूर्ण प्रकृति(क्षिति जल पावक गगन समीर)....विचारणीय तथ्य है ये भारतीय संस्कृति का अद्भुत शब्द जिसका बोध हो अगर तो...हम बुद्ध, महावीर,कृष्ण, कबीर,कलाम जीसस जैसे लोगों का सृजन करते है.... मैं मानता हूं कि ये शब्द ही भारतीयों के अध्यात्म को प्रदर्शित करता है....बिना मंगल सूत्र के ये सम्भव नही हो सकता कदापि नही... हमारे ऋषियों की ये परम्परा रही है कि योग्य को देख के ही ज्ञान प्रदान किया जाता है,,,नही योग्य मिला तो गीता भी अदृश्य हो जाये! कोई फर्क नही पड़ता। कुलबुलाहट नही है हममे, आज पूरा विश्व परमाणु हमलो के सम्भावनाओ से आतंकित है...ये क्यों हो ...

वन्दे मातरम!

मां के गर्भगृह से शैशव काल के समय तक की बातों में जो तथ्य स्मरण है मुझे वो एक तथ्य है,कि उस वक़्त मैं भयभीत होता था..तो एक बात से कि माँ मुझसे एक पल के लिए भी अलग न हो, और वो भी अंधेरों में सबसे ज्यादा, इसके अतिरिक्त कोई चाहत नही थी, आज 24 वर्ष की यात्रा के उपरांत मेरी मित्रता अंधेरो से हो गयी, और वो भी इसलिये क्योंकि अंधरो में घने अंधेरों में मैं शायद खुद से ज्यादा या ये कहिये की सम्पूर्ण रूप से मिलता हूँ, हांलाकि मेरी माँ को अक्षर ज्ञान नही है,किन्तु मैं मां को आजतक पीता हूँ, और रोज जब अंधेरा होता है तो मिलता हूँ खुद से तो शांत भाव से देखता हूँ कि माँ कहा तक मुझमे आ चुकी;और अब अभय भी हुँ क्योंकि पीते पीते माँ को ये ज्ञात हो गया कि अब माँ मुझसे अलग नही हो सकती अनन्त काल तक,ज्ञान मुक्त करता है,जो मुक्त न करे वो ज्ञान नही हो सकता,सूचना भले हो,ज्ञान नही हो सकता। और अब उन तकनीकों की खोज जारी है जिससे मैं माँ को प्रसारित कर सकूँ, जिसदिन मैं माँ को सम्पूर्ण रूप से संसार मे प्रसारित कर लूंगा मैं मुक्त हो जाऊंगा! और यही निर्वाण होगा! वन्दे मातरम!