आईने से संवाद!

१.आईने में उपस्थित दुनिया को स्पस्टीकरण!

हाँ! हाँ! मैं निर्लज्ज हूँ,लाज का लेश मात्र भी मेरे अंदर न बचा,और अगर कोई गुंजाइश भी रहेगी तो मैं उसे बहा दूंगा! एक बहुत दर्दयुक्त फोड़े की तरह,जिसे बहाने में मुझे तकलीफ होती हुई है निरन्तर जबसे चैतन्यता की सृंखला का प्रारम्भ हुआ मुझमे!! मैं बिल्कुल निर्वस्त्र हो जाना चाहता हूँ, जब प्रकृति से कोई तकलीफ हो उस अनुसार कुछ धारण करना चाहता हूँ!

२.शराब भी खूब पिये हो ज़िंदगी मे!

हाँ बिल्कुल! बहुत पिया हूँ,और आत्मा की तृप्ति तक पी चुका हूँ,क्योंकि मेरी आत्मा की प्यास थी ये,बचपन से मुझे शराबियों-सा निश्छल कोई न मिला समाज में, शराबियों में कम से कम एक सार्थकता दिखी मुझे अपेक्षाकृत तथाकथित धार्मिक एवं सभ्य व्यक्तियों के! मुझे भी अपनी सभ्यता के आडंबर से निकलने के लिये ये पूर्ण चेतना के जागरण के लिये शराब का भरपूर सहारा लेना पड़ा और मैंने भरपर आनन्द भी लिया, जहां तक एहसास है मुझे मैं बिल्कुल मुक्त हुआ जो मूलभूत नैसर्गिक कमियां थी मुझमे, उससे! शराब के माध्यम से!  

३. मुक्त हो चुके हो?

हाँ, मुक्त हो चुका हूँ, परिलक्षित न होऊँ ये अलग बात है!

४..लिखते क्यों हो!

आंनद है लेखन, कोई जबरजस्ती नही है! पढा जाना उसका नियति है कौन पढ़ेगा कबतक पढ़ेगा ये उसकी नियति है! किसकी! लेख की!

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