Posts

Showing posts from November, 2021

समाधि ऐट 28 प्रकाशोत्सव!

१-जैसा कि इस लेख के शीर्षक को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर आप अनुमान लगा ही चुके होंगे!!  जी हाँ ये मेरी आत्मकथा का एक अंश हो सकता है। २-किंनुभार, ढकवा बाज़ार, पुलिस स्टेशन-सिकरीगंज जनपद गोरखपुर एवं अम्बेडकर नगर के दक्षिणी-उत्तरी संयोग(श्रीरामजानकी मार्ग) कुँवानो नदी के तट पर स्थित है। जहाँ श्री लालमणि दूबे एवं माँ आरती देवी के आपसी संयोग के कारण मेरा उद्भवम जन्म नवम्बर मास के(इशवी सन १९९३) २८ तारीख प्रातः ३:०० को हुआ।

महामानवी!!

हे रजनी हे-हे! रजनी तुम हो जीवन की इक जननी तुमसे मिलकर मैं जीवन वृहता को जान सका।। पहचान हुई मेरी खुदसे मैं लघुता से प्रस्थान किया विस्तृत इस जग की सुंदरता को अपने भीतर स्थान दिया।। मैं नितप्रति पल बस ये सोचू अब तुम हो इक दिव्यकिर्ति... मेरी ऊर्जा का ये प्रवाह तुमको पल भर में.. देखना तुम...चंद्रशेखर की शिखा से गंगा की धार निकाल... इस जग की अधूरी प्यास को.... संतृप्त करेगा, औऱ स्मित ये तुम्हारा मोहन को राधिका का दीवाना बनाकर इक मधुर तान जब छेड़ेगा।। जग इक लय में लयबद्ध हुआ.... तुमने ये किसलय कर ही दिया। तुमने खुद को विस्तीर्ण किया।। ब्रह्माण्ड धरा पर परिलक्षित किया।।

विद्यालय एवं कारावास

क्या विद्यालय और कारावास एक तरह के संस्थान हैं? यह प्रश्न विचारणीय है और इसपर विचार निम्नवत है। विद्यालय एक संस्थान है जहाँ बालक को सर्वसम्मति से भेजा जाता है। हाँ कुछ मामलों में प्रारंभ में नौनिहालों में यहाँ से जल्दी भाग जाने की प्रवृत्ति होती है किंतु ये प्रवृत्ति समय बीतने पर कम से कमतर होकर लगभग समाप्त हो जाती है। और अब बच्चों का सामाजीकरण प्रारंभ होता है,उसके कुछ मित्र बनते हैं और कुछ बच्चे उनके लिये शत्रु प्रतीत होते हैं किंतु समय बीतने के बाद उचित शिक्षा, मार्गदर्शन एवं सामाजीकरण के उपरांत ये शत्रुता भी समाप्त हो जाती है। विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने का निरंतर प्रयत्न होता रहता है जो काफी हद तक सफल भी होता है। विद्यालय का मूल मंत्र "शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइये" होता है। समाज मे शतप्रतिशत तो नही किंतु एक आध प्रतिशत को छोड़कर लगभग सबका जाना हुआ है, होता है एवं होता रहेगा। विद्यालय समाज एवं समुदाय के चहुमुखी विकास में महती भूमिका निर्वहित करता है। विद्यालय में जाना एक शुभ अवसर होता है। दूसरी तरफ कारावास एक दण्ड के विधानस्वरूप सृजित संस्थान है। कारावास का ...

पण्डित जवाहरलाल नेहरू!

मैत्री!

मैत्री एक भाव है ये भाव जिसने भी अपने अंदर विकसित किया वो सम्राटों का सम्राट होगा। जैसे जैसे आप मैत्री पर ध्यान देंगे और आपका ध्यान घनीभूत होगा आप सम्राट से महा सम्राट,चक्रवर्ती सम्राट बनने की तरफ भी घनीभूत है। ये ही विजय का सूत्र है। आपके भाव,विचार,स्थूल शरीर,सूक्ष्म शरीर एवं आस पड़ोस में सबको मित्र बनाइये, मित्र बनाने से ज्यादा मैत्री विकसित करिये। मैत्री को ही सूत्र बनाइये। एक दिन इस यात्रा में किसी भी क्षण जब मैत्री घनीभूत होकर पराकाष्ठा पर पहुँचेगी बस उसी बिंदु पर आप 'मैत्रेय' हो जाएंगे। पृथ्वी का अगला सम्राट मैत्रेय का उदय होने ही वाला है। आप के या मेरे या किसी के भी भीतर।