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Showing posts from November, 2017

प्रवृत्ति..

मै मानता हूं या ये कहो कि महसूस कर रहा हूं कि मैं कि मै खुद से खफा हुँ, और इसका कारण भी जानता हूं । कारण है कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ,मैं सबसे प्यार करता हूँ,तुम सब कभी कभी कही खो जाते हो, और इस दौरान सतत रुप से मैं स्वयं को भूल जाता हूँ, मैं स्वयंप्रकाश हूँ, मैं तुमसे भी प्रेम करूँगा ओह करने की बात कहा से आ गयी, प्रवृत्ति है प्रेम मेरी,प्रवृति है कण्टक हुँ कभी कभी! ये तुम समझो तुम्हे समझा नही सकता मैं। तुम खुद ही समझ जाओगे,इतनी सत्यता है।
तुम से मिलूंगा एक दिन तब कोई औपचारिक बन्धन नही होगा, मैं भी नग्न रहूँगा तुम भी ,उस वक़्त एक उत्साह घटित होगा। मैं कुछ भी नही बोलूंगा मुझे कुछ कहने की जरूरत नही रहेगी,हमारा निर्वस्त्र होना ही सब कह देगा। कितने वस्त्र कितने आभूषण ईजाद कर लिये हमने अबतक अब मैं निर्वस्त्र हूँ हमेशा,मुझे इंतज़ार है तुम्हारे निर्वस्त्र होने की। शून्य का बोध नग्न होने से ही होता है बिना नग्न हुए हम सत्य से अपरिचित ही रहेंगे।

आकांक्षा

कुछ पल में ही,पल पल भर में एक-एक शब्दों को पीरो-पीरो एक महाकाव्य लिख डालूँगा संघर्ष कठिन है मनन किया, फिर आत्मशक्ति को जतन किया।। धीरे धीरे खुद को खोकर इस मार्ग निरन्तर चलना है कुछ कष्ट विषाद, अनन्त अवसाद न बाधा बन पाएंगे,माला बनेगी दिव्य एक दिन ज्ञातव्य नही है ये भी किन्तु मुझे बहकर-चलकर खुद को पाकर खुद को खोकर एक राह पे चलते जाना है; एक मार्ग नया दिखलाना है।। सब को मयूर के पंख सदृश, कोयल की कू-कू भाव अदृश्य निज को समेट विस्तीर्ण किये इस युग में पुष्प खिलाना है।। हूँ गुनहगार,कलंकित भी ये बात पता है मुझको भी फिर एक कलंक को आलिंगन से कभी नही लगाना है तुम सब को उस ओर अग्रसित कर मुझको ये पाप मिटाना है तुम जैसे ही कुछ मैं भी हुँ बंदीगृह तुम,मैं मुक्त असीम भावो को गढ़ते गढ़ते मुझको दुर्भावों को मिटाना है।। ना मैं मील का पत्थर ना तुम ही मुसाफिर हो, बस राह है यहाँ, सांसे गिनाना है तुम को कलुषित नही करना है बस खुद का मार्ग बना बनाना है।।

सत्य संघर्ष

मैं बार बार ये विचार करता रहा कि साधुओं को किस प्रकार के संघर्ष करने पड़े होंगे,प्रत्येक साधु के जीवन मे विभिन्न प्रकार की समस्याओं का आगमन हुआ होगा।   दरअसल बात बहुत स्पष्ट है कि जब हम जन्म लेते है तो उस वक्त हम पूर्ण साधु होते है,किन्तु जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है,हमे अपने समुदाय एवं संस्कृति से होकर गुजरना होता है; इस दौरान हम गुण दोष के व्यूहों से भी होकर चलते है।   अतः अब हमें आवश्यकता होती है कि हम अपने सामाजिक जीवन को संतुलित बनाकर रहे।    फिर हमे साधु और असाधु के द्वंद्व से गुजरना होता है,और इस द्वंद्व के माध्यम से हम अपने इच्छाशक्ति से खुद को रास्ता देते हैं।     अब हमारी खोज प्रारंभ होती है,उन मार्गों की एवं क्रियाओ की जिससे हम खुद को इतना परिशुद्ध करे कि, सामाजिक क्रियाओं को करते हुए अपनी आत्मसंतुष्टि को भी प्राप्त करे,एवं जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ कर उसका सदुपयोग करें।     इस क्रम में हमारा समाज एवं वातावरण महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।      परिशुद्धता के इस क्रम में हमे स्तरीकरण को स्वीकार करना चाहिए। ...

सन्देश..

हे पथिक सुन, सन्देश है,कुछ पल चलोगे,कान में गर्म वायु, बहकर अप्सरा जाएगी, उस मोड़ पे जहां तुम विश्राम, को उद्धत हुए,कैसी विचित्र, विडम्बना तुमको यहाँ, निहार रही, जाओ तुम वहाँ, जाकर मिलो, उस नृत्यांगना से,गुर सीखो,कला सीखो,और कुछ मातृत्व भी, वात्सल्य और श्रृंगार भी, कुछ प्रेम के पथ पर चलो, खुद की खुदी को छोड़कर, हिंसक हुए यूँही तुम भटकते रह, जाओगे,जाओ वहां पर झीलों की, खुसबू है, इत्र है कुछ विशिष्ट, खो जाओ और पी भी, जाओ अश्रु जैसे रस को भी, उत्साह से उत्सर्ग को, चूमो,वहाँ झूमो वहाँ, लयबद्धता की गति में तुम, मैं को सुलगाते रहो फिर रस बहेगा,सृष्टि का, उसमे भिगो के अश्रु को, सृंखला का उद्धार कर, खुद को विसर्जित कर वहाँ, खो जाओ तुम आकाश में, मिल जाओ तुम संसार मे।

दृश्य

प्रत्येक प्रश्न का समाधान प्राप्त हो गया,अब निर्झरिणी हुँ मै, थोड़ा शीत थोड़ा उष्ण मन से पार, मन मे ही स्थित होकर महामाया से पार होकर,प्रस्फुटित हुआ,अनन्त मे, सर्वस्व स्थित प्रस्थिति सम्यक समीक्षा कर रहा, आगाज हूँ, न अंत हूँ, मध्य हूँ और फिर, तर गया हूं उस पार भी, इस पार भी, विस्तृत नही संकुचित नही, मैं मध्य हूँ मै मध्य हूँ, कोलाहल सभी अब भी समक्ष, किन्तु है अब संतुलित,संतुलित! सन्तुलित। विस्तृत हुआ सम्यक हुआ, नभ है कि अब बारिश हुई, सब रिक्त व्योम हुआ यहाँ, विस्तृत हुआ विस्तृत हुआ।

रसिक-विस्तार

राधा कृष्ण गोपी कृष्ण ,अनेक स्थानों पर कृष्ण रास रचाते है अलग अलग देवियों से,देवियों को डाह नही होता क्या? होता है, एक गोपी कृष्ण से पूछती है कि कान्हा यदि राधा को या हम सब को किसी अन्य पुरूष में आसक्ति हो तो क्या तुम्हें ईर्ष्या नही होगी, कृष्ण इस जिज्ञासा को शांत कर अपना विश्वदर्शन रूप दिखाते है गोपी को ,कहते है गोपी कोई और,अरे कोई भी इस संसार में या अनन्त तक मुझसे रहित नही हो सकता इतना विस्तार है इस रसिक का,और कृष्ण के इस उदार दर्शन ने सारे द्वंद्व को परिवर्तित कर दिया विशद समर्पण में। प्रेम में विश्व दर्शन हो जाता है।

अन्तराल

एक क्षण में होश आता है,नही तो तादात्म्य में जिंदगी गुज़र रही है हम लोगों की,एक क्षण बस एक क्षण,रंगमंचीय प्रतिस्पर्धा हो अगर रंगमंच का ख्याल रहे तो फिर एक ध्रुवीय हो गयी बात,और एक ध्रुवीय कोई निर्भर अस्तित्व नही होता अपितु उसकी एक प्रसारात्मक स्वायत्तता होती है।   फिर स्वायत्तता तो द्विज होने का प्रमाण है और ऐसे ऐसे कई जन्मो की परतों का खुलासा प्रारम्भ होता है,तुम हेतु मात्र हो, माध्यम हो जिसको तुम ये शरीर कहते हो,ये विलीन हो जाती है;और मजे की बात है कि तुम इसे प्रत्येक अंतराल पर और प्रगाढ़ करोगे।

Tranquility

Be positive,as if you start being in positivity, You will attain satisfaction. In Geeta Krishna says that all is good...All is well.. By following this philosophy, you will attain something very beautiful. See it- Don't compare, Don't cling with anything in your life. And learn to be happy in every situation. And Do whatever your intution advices you. Don't feel inferiority or superiority . Be just on the middle and enjoy your awareness.You should also not criticize anything.. See-that if you are not enlightened,you will not be able to understand the great action. Environment is protecting you so give tribute to it.And the main way to aweken yourself are in three steps 1-Be positive in each situation.All happenings are good,were good and will be good. 2-After attaining a mature level of your conscience of step 1 you just stay with that ... 3-Important thing is in it....That you have to leave it like it was also a dilemma ..And then you will be free and enligh...