अन्तराल

एक क्षण में होश आता है,नही तो तादात्म्य में जिंदगी गुज़र रही है हम लोगों की,एक क्षण बस एक क्षण,रंगमंचीय प्रतिस्पर्धा हो अगर रंगमंच का ख्याल रहे तो फिर एक ध्रुवीय हो गयी बात,और एक ध्रुवीय कोई निर्भर अस्तित्व नही होता अपितु उसकी एक प्रसारात्मक स्वायत्तता होती है।
  फिर स्वायत्तता तो द्विज होने का प्रमाण है और ऐसे ऐसे कई जन्मो की परतों का खुलासा प्रारम्भ होता है,तुम हेतु मात्र हो,
माध्यम हो जिसको तुम ये शरीर कहते हो,ये विलीन हो जाती है;और मजे की बात है कि तुम इसे प्रत्येक अंतराल पर और प्रगाढ़ करोगे।

Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!