सत्य संघर्ष

मैं बार बार ये विचार करता रहा कि साधुओं को किस प्रकार के संघर्ष करने पड़े होंगे,प्रत्येक साधु के जीवन मे विभिन्न प्रकार की समस्याओं का आगमन हुआ होगा।
  दरअसल बात बहुत स्पष्ट है कि जब हम जन्म लेते है तो उस वक्त हम पूर्ण साधु होते है,किन्तु जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है,हमे अपने समुदाय एवं संस्कृति से होकर गुजरना होता है; इस दौरान हम गुण दोष के व्यूहों से भी होकर चलते है।
  अतः अब हमें आवश्यकता होती है कि हम अपने सामाजिक जीवन को संतुलित बनाकर रहे।
   फिर हमे साधु और असाधु के द्वंद्व से गुजरना होता है,और इस द्वंद्व के माध्यम से हम अपने इच्छाशक्ति से खुद को रास्ता देते हैं।
    अब हमारी खोज प्रारंभ होती है,उन मार्गों की एवं क्रियाओ की जिससे हम खुद को इतना परिशुद्ध करे कि, सामाजिक क्रियाओं को करते हुए अपनी आत्मसंतुष्टि को भी प्राप्त करे,एवं जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ कर उसका सदुपयोग करें।
    इस क्रम में हमारा समाज एवं वातावरण महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।
     परिशुद्धता के इस क्रम में हमे स्तरीकरण को स्वीकार करना चाहिए।
      धैर्यपूर्वक होना प्रत्येक परिस्थितियों मे ये मानवीय सद्गुण होता है,क्योंकि धैर्य का अर्थ है एक सम्बल युक्त शक्ति जो हमे कठिनाई से जूझने का गुर सिखाती है।
       व्यावहारिक संतुलन में एक तथ्य जो अति महत्वपूर्ण है वो है,तुलना से बचने का,या सकारात्मक तुलना में संलग्न होना,क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की एक महत्ता है,जिसे हम सामान्य या विशिष्ट दोनो कह सकते है;और प्रत्येक व्यक्ति को स्वीकार कर लेने की क्षमता आते ही हम कई मानसिक रोगों से मुक्त होते रहते हैं, जिससे आत्मोत्थान होना प्रारम्भ होता है।
        और इस आत्मोत्थान कि प्रक्रिया मात्र प्रारंभ है क्योंकि इसका कोई दूसरा छोर नही है,एक बार प्रारंभ होने पर हमें प्रकृति के प्रक्रिया के साथ बहते हए होश में रहने की कला सीखनी होती है;और ये कला हमे योग के मार्ग कि ओर अग्रसर करती है,अर्थात हमे योग को प्रारम्भ करने को निर्देशित करती है।

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