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Showing posts from October, 2017

प्रयत्न

प्रयत्नों का मनोवैज्ञानिक आधार है,प्रयत्न आसक्ति से नही करना,और ये कितना विरोधाभासी प्रयत्न है तुम्हे समझाने का ,खुदी को भूलना नही,सम्यक स्मृति कठिन है,लगेगा सरल किन्तु कठिन, जागना प्रत्येक पल कितना दूभर है,फिर कुछ भी अकस्मात नही होगा,बिल्कुल तुम्हे ज्ञात होगा,श्रोत से जुड़ गए तुम,तब प्रयत्न कर सकते हो,क्योंकि मुक्त हो गए,तुम्हारे अंदर मुक्तिबोध का जागरण हो गया,प्रस्फुटन हो गया अब रुकने से भी नही रुकेगा,और एक मज़े की बात की तुम अब रोकोगे भी नही,बहोगें तुम जागृत अवस्था मे,योग में अधिस्थित हो गए तुम अब तुम्हे विश्लेषण की आवश्यकता नही,अब तुम आदि से जुड़ गये, कोई आवश्यकता नही तुम्हे, इसलिए प्रयत्न समझ के करना क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक प्रयत्न पेंडुलम हो जाएगा,फिर तुम्हे मध्य की आवश्यकता का भास होगा! फिर तुम मध्यम मार्गी हो गए, किन्तु ये तुम्हारे तय सीमा से परे होगा, कब होगा,समय पर होगा, किन्तु होगा अवश्य, परिपक्वता आने पर होगा।

The happiness.

Something something is being on. We are viewer,we should not disturb, And also we should not cling with any happening, otherwise we will suffer, The basic philosophy of being happy is to let go all the thing and be patiencefull ...

दोषारोपण

इस समय या प्रत्येक समय ये एक तरह की प्रवृत्ति रही है कि दोषारोपण किया जाए। दोषारोपण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे वह व्यक्ति जो दोषारोपण करता है उसके क्षति की ज्यादा सम्भावनाये है,क्योंकि वो आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया से तत्क्षण पलायित हो जाता है। दोषारोपण कभी कभी आवश्यक है,और जो नित्य आवश्यक है वो है आत्मविश्लेषण ,क्योंकि आत्मविश्लेषण से तत्क्षण निर्णय को टाला जा सकता है। आप का दोष दिखाता समाज आपको सुअवसर देता है कि आप स्वयं को परिमार्जित करें। उत्तम रूप में खुद को प्रकट करने में सक्षम हो,तत्क्षण निर्णय कभी आपके लिये शुभ चेतन का कार्य नही करता बल्कि आपजो जिम्मेदारियों से भाग जाने को निर्देशित करता है,जिससे आप दीर्घसूत्री हो जाते है। दीर्घसूत्री होना एक प्रकार की व्यक्तिगत व्यक्तित्व विषयक कमी है जो आपको आनन्द के सर्वोत्तम रूप को प्राप्त करने में बाधक होता है। राजनीतिक व्यक्ति यदि अपने लिये कुछ विशेष कर सकता है तो उसको दोषारोपण नही करना चाहिये एवं खुद का निरीक्षण करना चाहिये। जिससे समाज विकास के सकारात्मक दिशा को प्राप्त होता है।

भोर!

भोर का मोर विस्मृत हो गया, नूतन दिनचर्या में, दांतुन अब जमाने का विषय है, क्या खोया क्या पाया, अब भोर के लोग, पलायन कर रहे हैं, किसी अन्य दुनिया की ओर, उर्जाविहीन हो जाएंगे, वो लोग भोर का सामना कर कर के, क्योंकि अब बहिर्मुख यात्रा, कर रहे है, फिर भोर के मायने बदल गए!

Maaa

You don't complain for , The sin,you are full of, Love and affection...I feel Low in your absence, You provide each and every thing I didn't care about you, Even I ignored you in my Bad mood. Thy presence is a source of Eternal love.... People says you are illiterate But I see you excellent in all My caring,you teach me to give, Not to take. You teach me the lesson I don't find In any books, You are "Maa" Always giving I think how I can be so lazy and A burden to the earth ..... When I lived in a beautiful woumb, You are eternal,you are divine.. I am doing only bullsit all the Time you are in my thinking, Even I only write you in my Each lines... Even you are illiterate....But there should Be a deep knowledge of words and grammar To express you within me..... One day I will be known As an eminent scholar..... But you would always be my Inspiration......

Manner!

See how the manners , Imposed upon us, Is despoiling our lives, Let us be free, friends Sometimes be mannerless, Necessarily will make you free, Mannerless ness is actually a art. It comes u out from the bondages, You have been engaged in being manner full, That is why you are going in deeper bondages. . Let us be free and follow the consciousness... And enjoy the hollyness of your soul.. Be free be free from all the rituals Let the Masters be the master of yourself...

प्रेयसी

शून्य देखा तुम्हे,सबसे पहले, फिर थोड़ा तो आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा, लेकिन ये कुछ मायने नही रखता, फिर अकस्मात, ये अकस्मात तो कह दिया, लेकिन प्रक्रिया लंबी है, भाव बनने प्रारम्भ हुए, दो तरह है,प्रदर्शन का,एक तुम्हारे, पिता की तरह एक तुम्हारे पुत्र की तरह, दोनों साँचो में तुम ढलती हो, अज़ीब है लेकिन सच है, भाव पुनः प्रारंभ अब थोड़ा परिवर्द्धन, अब निर्भीकता को अग्रसर मैं भी, तुम भी तब तो योग संयोग हो गए, पुनः भाव और कल्पना, कल्पना की गहनता गहराती है, फिर तुम समक्ष हो,तुम्हारा चाहना यहाँ कोई मायने नही रखता, अब मैंने सम्वाद प्रारम्भ किया, तुम से भाव फिर गहन हुए, तुमको भी शायद बेशब्री रहती अब, अब ख़्वाब तुम्हारे औऱ हमारे, दो केंद्रों से हो कर एक केंद्र की, तरफ यात्रा करते है, तुम्हे प्रस्तावित करने की आवश्यकता नही, की तुम प्रेयसी हो , प्रेयसी!

ठिठोली

याद है सखी तुम्हे एक बार गलती से मुर्दाबाद कह दिया था, नादान था मुझे मालूम भी नही थे, शब्द के मायने, बस ठिठोली थी बचपन की वो, फिर तुम्हारा रूठ कर, हा, रुठ कर ही नही, बल्कि पूरे जोर से रोना जैसे, सचमुच तुम मुर्दा हो गयी थी, हम्म हम्म" मम्मी से कहब अब" बहुत मासूम सा था स्मित तुम्हारा, मैं भी बिल्कुल डर गया था, स्मरण है मुझे वो दिन, अमरूद का पेड़, कर 'कित्त कित्त" का खेल ,अब उतनी मासूम नही तुम ,पर तुम्हारे यादों के ज़िल्द का वो बहुत सुनहरा पन्ना है अब सखी तुम हमेशा खुश रहो, उस वक़्त के खुशी के लिये यही तो मांगना था मेरा!

गति

हा मालूम है मुझे ,तुम्हे, निशानी चाहिये,सब्र करो, भरूँगा तुम्हे पहले भावों से, फिर सुलझाऊंगा तुम्हारी जुल्फों के साथ तुम्हारे मन को,उर को, फिर उतरूंगा धीरे धीरे, प्रेम सरोवर में,तुम्हे लम्हा लम्हा, निर्भय और अभय करता जाऊंगा, अभय होते ही तुम खुद जुड़ जाओगे, अनन्त सत्ता से,आराम देते हुए तुम्हे, इतना योग्यतम की ओर अग्रसर करूँगा, अनन्त का एक ,एक आगन्तुकआएगा, खुद तुमतक मेरी प्रतिच्छाया! जो तुम्हे मुक़्क़म्मल करेगा थोड़ा सब्र तो करो!

हवन कुण्ड

हवन कुंड जीवन है ये अद्भुत अद्भुत स्मृतियां है,एक एक क्षण का बाज़ीगर, ये जान चुका जो सब रहस्य, कैसी बेसुध वाणी उसकी क्या तुम समझ सकोगे, ना ना ना हो ही नही सकता ये तुमसे कब सम्भव है, बस बिखर बिखर के बिफर बिफर के , अपनी राम कहानी,का प्रवचन, कैसी लज़्ज़ित जीवन शौली के वाहक बन, तुम नाच रहे हो, जरा ठहर कुछ वक्त बिखर के अंधकार तो देख सखे, आलिंगन को तरश रहा ये अंधकार भी हे मानव!

भूखे का भ्रम

क्यों प्रकाश की भूखी दुनिया, क्यों इतना दावानल है, ये भूख एक भीख है, जो तुम्हे दिव्यप्रभा से दूर कर देगी, प्रारंभ से वंचित हो जाओगे तुम, बिल्कुल विरोधाभास है यहाँ, सतियों की वैष्यवृत्ति, एवं वैश्याओं का सतीत्व, तुम शायद देख न सको, क्योंकि अंधकार से चिढ़ है तुम्हे, बड़भागी होते है वो लोग जिन्हें अंधकार, मयस्सर होता है और विजयी होते है वो, जो अपना हृदय मुक्त कर देते अंधकार में, और जिनको अंधकार देखना हो, फिर उन्हें तुम्हारे जैसे आँखों की कोई आवश्यकता नही, उनकी बौखलाहट भूख से नही होती, जरा अंधकार को स्वीकार तो करो!

पथिक

चल रहा हूँ मै, चल रहे हो तुम, मन्ज़िले अज्ञात है, फिर भी चल रहे हैं, क्योंकि चलना हमे, दुसरो की दृष्टि में सफल, सिद्ध कर देता है, मात्र चलते रहना, किन्तु अगर रुक सको, तो रुक लो , क्योंकि रुकते ही, मन्ज़िले ज्ञात हो जाएंगी, मेरे मित्र पथिक!

विस्तार

विस्तार एक रहस्य है,औऱ विवेकानन्द रहस्य को उजागर नही करते रहस्यों को जानना तुम्हारा धर्म है,रहस्यमयी दुनिया का उजागर करना तुम्हारा धर्म नही,क्योंकि उसके परिणाम भयानक होंगे, इसलिए यदि कोई वास्तविक रहस्य का जानकार है तो वो भविष्यवाणी नही करता, यही हम भारतीयों ने किया,दुनिया के वैज्ञानिक आज जिन जिन रहस्यमय तथ्यों को सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहे है भारतीय उन रहस्यों को सदियों से जानकर मौन है!