ठिठोली

याद है सखी तुम्हे एक बार
गलती से मुर्दाबाद कह दिया था,
नादान था मुझे मालूम भी नही थे,
शब्द के मायने,
बस ठिठोली थी बचपन की वो,
फिर तुम्हारा रूठ कर,
हा, रुठ कर ही नही,
बल्कि पूरे जोर से रोना जैसे,
सचमुच तुम मुर्दा हो गयी थी,
हम्म हम्म" मम्मी से कहब अब"
बहुत मासूम सा था स्मित तुम्हारा,
मैं भी बिल्कुल डर गया था,
स्मरण है मुझे वो दिन,
अमरूद का पेड़,
कर 'कित्त कित्त"
का खेल ,अब उतनी मासूम नही
तुम ,पर तुम्हारे यादों के ज़िल्द का
वो बहुत सुनहरा पन्ना है अब
सखी तुम हमेशा खुश रहो,
उस वक़्त के खुशी के
लिये यही तो मांगना था मेरा!

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