प्रयत्न

प्रयत्नों का मनोवैज्ञानिक आधार है,प्रयत्न आसक्ति से नही करना,और ये कितना विरोधाभासी प्रयत्न है तुम्हे समझाने का ,खुदी को भूलना नही,सम्यक स्मृति कठिन है,लगेगा सरल किन्तु कठिन, जागना प्रत्येक पल कितना दूभर है,फिर कुछ भी अकस्मात नही होगा,बिल्कुल तुम्हे ज्ञात होगा,श्रोत से जुड़ गए तुम,तब प्रयत्न कर सकते हो,क्योंकि मुक्त हो गए,तुम्हारे अंदर मुक्तिबोध का जागरण हो गया,प्रस्फुटन हो गया अब रुकने से भी नही रुकेगा,और एक मज़े की बात की तुम अब रोकोगे भी नही,बहोगें तुम जागृत अवस्था मे,योग में अधिस्थित हो गए तुम अब तुम्हे विश्लेषण की आवश्यकता नही,अब तुम आदि से जुड़ गये, कोई आवश्यकता नही तुम्हे,

इसलिए प्रयत्न समझ के करना क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक प्रयत्न पेंडुलम हो जाएगा,फिर तुम्हे मध्य की आवश्यकता का भास होगा!
फिर तुम मध्यम मार्गी हो गए,
किन्तु ये तुम्हारे तय सीमा से परे होगा,
कब होगा,समय पर होगा,
किन्तु होगा अवश्य,
परिपक्वता आने पर होगा।

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