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Showing posts from July, 2024

समर्पित प्रेयसी!

कहना है बहुत कुछ तुम से   मगर कैसे कहूं   कह नहीं सकती  मैं मिलना चाहती हूं  तुम्हें भरना चाहती हूं बाहों में  इसका मतलब वासना कतई नहीं मैं स्पर्श करना चाहती हूं  तुम्हारी आत्मा को   टटोलना चाहती हूं  तुम्हारे मन को  मेरे लिए उसमें  अथाह प्रेम है कि नहीं मैं चाहती हूं तुम अपने प्रेम से  मेरे आंखों के आंसुओं को सोख लो   सुखे वीरान पड़े जीवन में  प्रेम की बारिश कर दो मेरा अथाह समर्पण है  उस पुरुष के लिए   जिसे मैं हृदय से प्रेम करती हूं  उसके सिवा कोई स्पर्श नहीं कर सकता  जन्मो जन्मांतर  इंतजार कर सकती हूं  मुझे सिर्फ तुम ही चाहिए   जिसके सामने सहज महसूस कर सकूं  उतार फेंकू अपने मुखौटे  रो सकू जार जार   हंस सकू खुल के  बेझिझक सर रख सकूं कांधे पर मुझे सिर्फ तुम्हारी चाहत है   माथे की तरह चूम सकू तुम्हारे चरणों को भी  बस तुम्हारे स्पर्श मात्र से  पुलकित हो जाए मन  और कर दूं समर्पण   पूर्ण हो अस्तित्व मेर...

प्रेमिकाएं

 दिन कैसा गया तुम्हारा ? कुछ पैसे चाहिए हो तो बताना तुम ठीक तो हो ना ? ये सवाल केवल प्रेमिकाओं ने ही पूछा.. रोज शाम को घर लौटते वक्त   ना मांगी कल्पनाओं का शहर  नही मांगा तारो से भरी आकाश,ना मांगा कवि के कोई शब्द.. तुम्हारे संघर्ष कि साथी रही प्रेमिकाओं ने  तुम्हारी कामयाबी के सपने देखे और उसे  पूरा करने के लिए सदैव तुम्हारे साथ खड़ी रही । उन्होंने उस सिंदूर कि कीमत भी अदा कि  जो उनके हिस्से में कभी आया ही नहीं...

जीत... !!

 "करारी हार के शिकार लोग ही, जीत के असली हकदार होते हैं  सबकी नजरों में बेकार लोग ही, जीत के असली हकदार होते हैं  हजार नहीं, दो-चार लोग ही, जीत के असली हकदार होते हैं  सर्वस्व खोने को तैयार लोग ही, जीत के असली हकदार होते हैं  मुश्किलों से सदाबहार लोग ही, जीत के असली हकदार होते हैं

एक दुनिया समानांतर!

 क्या हम ऐसे संसार का निर्माण कर सकते हैं जिसमे युद्ध न हो,जिसमे अत्याचार न हो,जिसमे देशों की सीमाएं न हो,कोई कहीं भी आ जा सके,कोई बंधा हुआ न हो,पूरा विश्व प्रेम से सराबोर हो! ये कल्पना है या ये कह सकते हैं कि दिवास्वप्न है,प्रतिशत में इसका अस्तित्व दशमलव के बाद अनेको शून्य के बाद कहीं जाकर है! है, ये निश्चित है,हो सकता है ये निश्चित है,इसका अस्तित्व है जरूर और यदि रच मात्र भी हमें ये दिख सकता है तो हमे इस ओर सोचना चाहिये हालांकि वर्तमान में इसके विपरीत ही सारे अनुसन्धान एवं पृथ्वी का समस्त श्रम लगा हुआ है इससे कोई भी नकार नही सकता! लेकिन जिस रंच मात्र की खोज एवं प्रसार की यहाँ बात हो रही है यदि उस ओर मानवता अग्रसित हो गयी तो तस्वीरें बहुत अलग हो सकती है पूरी दुनिया समृद्धि की नित नूतन शीघ्र गति से एक एक सीढ़ी चढ़ सकती है! लेकिन ये मानव का मानव मात्र हो जाने से होगा जो दिखता तो बहुत साधारण है किंतु साधारण चीजे बहुत असाधारण हो गयी है दुनिया के विकृत सभ्यताओं में! यदि मानव मानव हो जाये तो वो अतिमानव से ज्यादा चमत्कारिक हो सकता है! इसके लिये अध्यात्म और विज्ञान के सम्यक सम्मेलन होने आवश...

आठ दिन की दुनिया!

बेरी अंकल!... बेरी अंकल रिहैब में मिले,4 महीने हो गए थे उनको वहाँ, खूबसूरत व्यक्तित्व है उनका सीतापुर के आसपास के कहीं के निवासी हैं! 2003 में प्रेम विवाह किये थे,बता रहे थे कि जिस लड़की से 10 वीं से प्रेम किये, पहला प्रेम किये,उसी से विवाह किए,उस दिन उनका पचासवाँ जन्मदिन था,बाहर से बहुत मजबूत दिखने का भरपूर प्रयास करते थे किन्तु उनकी आँखों मे क़ैद होने का दर्द कम से कम मैं स्पष्ट देख सकता था,मैंने पूछा अंकल ,"जब आप यहां से निकलेंगे तो क्या करेंगे?" उन्होंने कहा,"जिस दिन निकलूँगा, खूब शराब पियूँगा" मैंने कहा कि आप फिर यहीं आ जायेंगे! वो कहें कि पहले  तय करूँगा कि देखो मैं बदलूँगा नही यदि बदलने की आश्वस्तता लेकर आई हो(उनकी पत्नी से) तो फिर मुझे यहीं रहने दो,मत ले चलो! जीवन मे बहुत पैसा कमाए हैं वो! मैं अनायास मुस्कुराया और चुप हो गया! वो अक्सर कहते कि दुनिया का आखिरी सत्य जो उन्होंने अनुभव किया यही था "कि तुम्हारा तुम्हारे सिवा कोई और नही है! इसलिये जो भी करना है अपने लिए करो,जीना है,अपने लिये जियो!,तुम्हारे मृत्यु के बाद तुम तत्क्षण भुला दिए जाओगे! किसी को कोई फ़र...

आईने से संवाद!

१.आईने में उपस्थित दुनिया को स्पस्टीकरण! हाँ! हाँ! मैं निर्लज्ज हूँ,लाज का लेश मात्र भी मेरे अंदर न बचा,और अगर कोई गुंजाइश भी रहेगी तो मैं उसे बहा दूंगा! एक बहुत दर्दयुक्त फोड़े की तरह,जिसे बहाने में मुझे तकलीफ होती हुई है निरन्तर जबसे चैतन्यता की सृंखला का प्रारम्भ हुआ मुझमे!! मैं बिल्कुल निर्वस्त्र हो जाना चाहता हूँ, जब प्रकृति से कोई तकलीफ हो उस अनुसार कुछ धारण करना चाहता हूँ! २.शराब भी खूब पिये हो ज़िंदगी मे! हाँ बिल्कुल! बहुत पिया हूँ,और आत्मा की तृप्ति तक पी चुका हूँ,क्योंकि मेरी आत्मा की प्यास थी ये,बचपन से मुझे शराबियों-सा निश्छल कोई न मिला समाज में, शराबियों में कम से कम एक सार्थकता दिखी मुझे अपेक्षाकृत तथाकथित धार्मिक एवं सभ्य व्यक्तियों के! मुझे भी अपनी सभ्यता के आडंबर से निकलने के लिये ये पूर्ण चेतना के जागरण के लिये शराब का भरपूर सहारा लेना पड़ा और मैंने भरपर आनन्द भी लिया, जहां तक एहसास है मुझे मैं बिल्कुल मुक्त हुआ जो मूलभूत नैसर्गिक कमियां थी मुझमे, उससे! शराब के माध्यम से!   ३. मुक्त हो चुके हो? हाँ, मुक्त हो चुका हूँ, परिलक्षित न होऊँ ये अलग बात है! ४..लिखते क्य...