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Showing posts from April, 2020

अंत्योदय!

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी का दर्शन है! समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय या किसी भी सामाजिक सेवा का लाभ समाज का अंतिम व्यक्ति भी उतना ही पाए जितना प्रथम व्यक्ति! मेरे विचार से यदि तंत्र को पवित्र किया जाए तो पण्डित जी के विचार स्वतः लागू हो जायेंगे! एवं तंत्र के शुद्धिकरण के लिये शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों महती भूमिका निभाते हैं! शिक्षा से शिक्षक एवं शिक्षार्थी तथा चिकित्सा से चिकित्सक एवं रोगी सम्बंधित हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों मात्र प्रत्यय है स्थूल रूप से इन्हें विशाल बनाने वाले आधारस्तम्भ तो व्यक्ति ही है! व्यक्ति रोगी,शिक्षार्थी,चिकित्सक एवं शिक्षक या अन्य कोई भी हो सकता है। जिस समाज को उन्नति करनी है उसे सर्वप्रथम अपने शिक्षक और चिकित्सक को सर्वाधिक आदर देना चाहिए जिससे उनका उत्साहवर्धन होता रहे। कृषक का उल्लेख नही किया मैंने उसका कारण है कृषक बहुत महान होता है किंतु उसके पाल्यों को यदि शिक्षा नही मिली तो उसकी आने वाली पीढ़ी गुलाम होगी ये निश्चित है जो उसके लिये दुर्भाग्यपूर्ण होगा। किसान,शिक्षक एवं चिकित्सक यदि ये तीन ही समाज के प्रमुख रहेंगे तो समाज को पूरा विश्व आत्मसात क...

दर्पण

जाओ इस जगत से धरा से जुड़कर देखो आकाश.. तारे टिमटिमाते हुए दिखेंगे परन्तु ये टिमटिमाते हुए दिखने वाले तारे तुम्हारे नयनों की क्षमता के नाते हैं,असल में ये बहुत शक्तिशाली तेज से भरे हैं! ठीक तुम्हारा भी यही हाल है बेकार में बेहाल है अरे अपने अन्तस् के अंतर्गत दूर के तारे के करीब तो जाओ तब तुम जानोगे खुद की ऊर्जा को उमंग को तरंग को।। गिड़गिड़ाने से तुम्हें कुछ नही मिलेगा पहचानों खुद को,जानो तब मानो पथ पे चलो,पथिक नही योद्धा बनकर घृणा, द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध,विषय, वासना से होशपूर्वक पार तो हो जाओ तुम्हारा कल्याण होगा जगतकल्याण होगा।। जाओ छोड़ो जानो मानो! अपनाओ इस नूतन पथ को! सादर प्रभाकर!

हंसिनी!

मैं अपने पुत्र को लेकर छत पर सो रहा था ज्येष्ठ की रात्रि में,तुम अजनबी थी, मेरे लिए एवं मैं भी तुम्हारे लिये, मैं सोता नही हूँ कभी भी,हाँ विश्राम करता हुँ, तुम्हारा आना तुम्हारा चद्दर उठा कर मच्छर से बचाने के लिये मुझे एवं पुत्र को ढककर फिर वहां से हट जाना! मैं मौन देखता रहा हे हंसिनी तुमको और अचानक एक तरंग उठी मेरे अंदर,मैं परिचित हुआ उसी क्षण आपसे! हे हंसिनी तुम महाश्वेता हो!
जो तुमको संकर्षण से द्विज रूप दिलाये,खुद को वो अपनी कठिन डगर के कुछ हालात कहो, कुछ बात कहो!