दर्पण

जाओ इस जगत से
धरा से जुड़कर देखो आकाश..
तारे टिमटिमाते हुए दिखेंगे
परन्तु ये टिमटिमाते हुए दिखने
वाले तारे तुम्हारे नयनों की क्षमता के
नाते हैं,असल में ये बहुत शक्तिशाली तेज से
भरे हैं!
ठीक तुम्हारा भी यही हाल है
बेकार में बेहाल है
अरे अपने अन्तस् के अंतर्गत दूर
के तारे के करीब तो जाओ
तब तुम जानोगे खुद की ऊर्जा को
उमंग को तरंग को।।

गिड़गिड़ाने से तुम्हें कुछ नही मिलेगा
पहचानों खुद को,जानो तब मानो
पथ पे चलो,पथिक नही योद्धा बनकर
घृणा, द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध,विषय, वासना
से होशपूर्वक पार तो हो जाओ
तुम्हारा कल्याण होगा
जगतकल्याण होगा।।

जाओ छोड़ो जानो मानो!
अपनाओ इस नूतन पथ को!

सादर
प्रभाकर!

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