समर्पित प्रेयसी!
कहना है बहुत कुछ तुम से
मगर कैसे कहूं
कह नहीं सकती
मैं मिलना चाहती हूं
तुम्हें भरना चाहती हूं बाहों में
इसका मतलब वासना कतई नहीं
मैं स्पर्श करना चाहती हूं
तुम्हारी आत्मा को
टटोलना चाहती हूं
तुम्हारे मन को
मेरे लिए उसमें
अथाह प्रेम है कि नहीं
मैं चाहती हूं तुम अपने प्रेम से
मेरे आंखों के आंसुओं को सोख लो
सुखे वीरान पड़े जीवन में
प्रेम की बारिश कर दो
मेरा अथाह समर्पण है
उस पुरुष के लिए
जिसे मैं हृदय से प्रेम करती हूं
उसके सिवा कोई स्पर्श नहीं कर सकता
जन्मो जन्मांतर इंतजार कर सकती हूं
मुझे सिर्फ तुम ही चाहिए
जिसके सामने सहज महसूस कर सकूं
उतार फेंकू अपने मुखौटे
रो सकू जार जार
हंस सकू खुल के
बेझिझक सर रख सकूं कांधे पर
मुझे सिर्फ तुम्हारी चाहत है
माथे की तरह चूम सकू तुम्हारे चरणों को भी
बस तुम्हारे स्पर्श मात्र से
पुलकित हो जाए मन
और कर दूं समर्पण
पूर्ण हो अस्तित्व मेरा
मुझ में तू नजर आए
तुझ में मैं नजर आऊं
जैसे रूप हो अर्धनारीश्वर का।।
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