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Showing posts from May, 2018

परिचय!

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मैं मस्त हवाओं का आज़ाद परिंदा हूँ.... उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा........ मर जाऊंगा जीकर जीवन तृष्णा सारी पी जाऊंगा।। नीलकंठ जब हो जाऊंगा विष समस्त! हाँ समस्त! निगल कर उदर में भी जाने न दूंगा! उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा जख्मों को मरहम न देकर गहरा जख्म दिये जाऊँगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा!

यूँ ही!(एक श्रृंगार पुकार)

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यूँ ही कुछ प्रारंभ करू मै तुम भी कुछ समझाओ ना भूली-बिसरी बाते हैं बस तुम तो सांसो में चलती हो। क्या लिख दू? कैसे लिख दू? कि तुम दौड़ी चली आओ ना मन मेरा वीरान हुआ-सा सहम-सहम के रह जाता जन्म-जन्म की सारी तृष्णा पल भर में मिटवाओ ना।। इतना सन्नाटा जीवन मे तूफ़ान पुकारता है....आओ प्रिय आ जाओ प्रिय मन कि मैल धुलाओ ना। वैराग्य! जो उपजा है मन मे उसको अखण्ड बनवाओ ना।।

काली

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तुम काली जैसी जिद पर थी मैं बस विष्णु-सा बन बैठा था... जब मैं शंकर बन लौट आया तेरी ममता को छोड़ आया। अब छोड़ तुम्हारा ज़िद्दीपन मुझको अपनापन स्मृति होता... एक सूर्य चला-सा अनवरत एक भाल चूम के दिवंगत। एक यक्ष प्रश्न प्रताड़ित करता उर को किस नेत्र से तुमको देखूंगा। हा आँख मूंद लूंगा मैं प्रिय हा राह त्याग दूंगा मैं प्रिय!

निठल्ला!

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मुझे मत याद करिये मैं निठल्ला हूँ... नींद बड़े तप के बाद मयस्सर होती है। नींद से क्यों प्रेम है मुझे नींद मृत्यु-सी है सवेरा जन्म जैसा है। यूँ तो दर-दर की ठोकरें आहिस्ता-आहिस्ता मुझे मुकम्मल करती जा रही हैं। कभी-कभी चिंतित होता हूं आप मेरा साथ निभा पाएंगी की नही... क्योंकि कइयो ने निभाने का स्वांग रचा कर मुझे परित्यक्त कर दिया। फिर भी मेरा निठल्लापन मुझे अच्छा लगता है...लोगों का परित्याग सम्बन्धियो से लेकर अजनबी तक, मुझे एक विशिष्ट जहां में लेकर गया जो आँखे बंद करने से खुलता है। इसलिये हे प्रिय,प्रिया अर्धांगिनी बनने के पूर्व हज़ार बार विचार कर लीजिएगा!

काफिला-ए-कृष्ण!

कोई मीरा,कोई राधा! हज़ारों गोपियाँ तरसें.. हज़ारों ख्वाब है जलते... लगी है आग बस विरह की मगर नही रुकेगा कि ये कृष्ण का है काफ़िला... है कृष्ण का ये काफिला! अहिंष्य!

भामती!

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मुझे मन्दोदरी की आवश्यकता थी.. और आप रत्नावली हैं तो कैसे हमारा मेल होता? नही होता कदापि नही होता!

चन्दरलेख..२

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संध्या में ढलता  सूरज,संकल्प दिवस का लेता है, तम की जड़ता से लड़ लड़ कर,एक नया सवेरा देता है। यदा कदा जब मेघ सभी,आभा इसकी हर लेते हैं, रोक किरण को इसकी वे ,अश्कों की वर्षा देते हैं। इस विषम घड़ी में दिनकर ये ,तनिक नही घबराता है, चीर मेघ के उर को ये ,पथ अपना पुनः बनाता है। चलता रहता है प्रतिपल ये,पथ से न डिगने पाता है, संकल्पों संग जीना ही ,सूरज हमको सिखलाता है। तेरी आभा से चंद्र भी ये ,फिर दीप्तियुक्त हो जाता है, चलते रहना पथ पर अपने ,संकल्प यही दोहराता है। संकल्प ही हैं इच्छाशक्ति,ये ही उन्नति के 'राज़ 'हैं, एक बार अगर ये सध जाए,न रुकता कोई काज है।

चन्द्र-लेख(मित्रता)

मेरा पहला लेख ************** मेरे प्यारे मित्रों,आधुनिक चंद्र नाम से कविताएं लिखते लिखते जीवन मे संतृप्तता आ गयी थी,सोचा क्यों न गद्य में भी हाथ आजमाया जाए।वस्तुतः इसकी प्रेरणा मेरे अद्यतन मित्र ने ही दी और वे मेरा कोई लेख पढ़ने के इच्छुक भी थे अतः मैने भी सोचा कि श्री गणेश कर ही देना चाहिए।काफी सोच विचार किया कि किस विषय पर लिखूं सांसारिक,आध्यात्मिक,राजनीतिक,इह लौकिक या पारलौकिक।असंख्य विषय मस्तिष्क में दंगल मचाने लगे।फिर एक निर्णायक की भांति आकर मेरे मस्तिष्क ने इस दंगल को रोका, जो अब दंगल कम उलझन ज्यादा प्रतीत हो रहा था।फिर अचानक मस्तिष्क ने ही फुसफुसाकर कहा-मित्र ने प्रेरित किया है तो मित्रता पर ही क्यों नही लिखता।क्यों बेवजह राई का पहाड़ बना रहा है। तो ये कहानी है मेरे विषय चयन की। विषय तो चुन लिया -मित्रता।लेकिन क्या मित्रता पर कुछ नया है लिखने के लिए मेरे पास।अनेक मनीषि गण तो पहले ही इस शीर्षक का पोस्ट मार्टम कर चुके हैं ।सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को तो उधेड़ उधेड़ कर सामने रखा गया है उनके द्वारा ।अब यही सोच रहा था कि कुछ बचा नही है लिखने को इस विषय पर तो रहने ही देता हूँ।तभ...

हे प्रिय

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तुम क्यों मुझको मेरी ही स्मृति में आकर मेरी तन्हाई का एहसास दिलाती रहती हो।। मेरी सिद्दतता भरी मोहब्बत का मजाक बनाती रहती हो, जब मैंने है छोड़ दिया... तुमको तुम्हारी मर्जी पर।। यादों में आकर मुझको क्यों सताती रहती हो। तुम क्यों मुझको याद दिला कर कष्ट-रात्रि देती हो। है निवेदन हे प्रिय! तुमसे मुझको तन्हा चलने दो.. जग-विस्मृत कर जग के ख़ातिर मुझको उद्दम करने दो। छोड़ दिया तुमने मुझको जब यादों में भी आओ ना, रोम-रोम परिमार्जित करके अपनी धूनी रमाओ ना... मैं तो निकल चुका उस दिन ही जिस दिन माथे पर आपके चुम्बन अर्पित कर निकला था... हे प्रिय हर जगह से मुक्त कर मुझे कैवल्य-कामी बनाओ न.... ढाई अक्षर प्रेम का सखी मुझको तुम समझाओ ना। हे प्रिय यादो-से मुझको कुक्कर की तरह दुर्दुराओ! ना! हे प्रिय!

शरत चन्द्र...१

मैं नाविक जीवन नौका का,कर्म मेरी पतवार है, भावुकता है नदिया मेरी,जिसमे बहता प्यार है। नौका मेरी सुख दुख सहती, आगे बढ़ती रहती है, प्रेम सुधा के पावन जल में,खूब हिलोरे भरती है। कर्मों की पतवार मेरी ,जीवन नौका को खेती है, नितप्रति आगे पीछे होती,पर विश्राम न लेती है। लक्ष्य सदा इसका है ,दिनकर की किरणों के संग चलना, रात्रि कालिमा ले आये तो,चंद्र को ही थामे बढ़ना। उद्वेलित ये नदी, सदा न यूँ ही यहां ठहरती है, पीड़ा के तूफानों से,ये दूभरतायें भरती है। ऐसे में क्या उचित रहेगा,मेरा पीछे हट जाना, मन को अपने छोटा करके,मैं निर्बल हूँ रट जाना। मैं तो हूँ शून्य का अंशी, जिसमें कोई रार नही, जो इससे भिड़ जाए तो फिर ,उसका बेड़ा पार नही। धवल ज्योति से सराबोर हो ,प्रेम गीत मैं गाऊंगा, जीवन की नौका को ,दरिया पार वहाँ ले जाऊंगा। जहाँ सदा रहता है निकला, आशाओं का वह दिनकर, सिखलाता जो बढ़ते रहना ,अपने जीवन के पथ पर । आभा लेकर उसकी मैं ,अंधेरों को चमकाऊँगा, प्रेरित होकर उनसे,अब मैं धवल चंद्र बन जाऊंगा।

मुकम्मल-विछोह!(एक प्रेम कथा)

पहली मुलाकात तो यूँही हो गयी,अकस्मात राह चलते-चलते..उसके बाद इश्क़ की शुरुआत हुई। दिन-रात बाते होने लगी प्रेम-प्रचण्ड हो गया..  आनन्दी ने एक दफ़ा पूछ ही लिया मुझसे,"तुमने मुझमे क्या देखा शिवेश! जो मैं इतना भा गयी तुम्हे?" मैंने कहा,"माँ, एक ऐसी माँ जो विवेकानंद को जन सके।" आनंदी एक-टक मुझे देखने लगी। आनन्दी की दिव्यता को भांप-कर ही मैंने ये जवाब दिया था। अब चुकि सामाजिक अभियंत्रिकी में मेरा और आनन्दी का मिलन सम्भव नही था अज्ञात कारणों से। हम दोनों पुनः अजनबी हो गए। कुछ विछोह बीत जाने के बाद एक दिन किताब की दुकान पर आनन्दी ने मुझसे पूछा,"अब विवेकानंद का जन्म कैसे होगा?" मैंने कहा,"विवेकानंद को जन्मने देने के लिए वीर्य की और गर्भाशय की आवश्यकता भी नही एक संकल्प की आवश्यकता होती है जो आप में है।" तदुपरांत शिवेश,आनन्दी को निहार खूब रोया, उसे मालूम था कि आनन्दी सब बर्दाश्त कर सकती है किंतु शिवेश का रूदन नही। फिर शिवेश अपनी एकांत दुनिया मे चला गया। आनन्दी अपने घर गई.. शिवेश के दिये सारे तोहफों को अपने उर से लगा कर कमरा बन्द कर खूब रोई... य...

गंवार

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मानवता बस धर्म है जिसका,जाति है जिसकी केवल प्यार, कर्मपथी वह निर्मल निश्चल ,कहते जिसको सभी गंवार। छल से जो खुद छला हुआ है,प्रतिशोध नही जिसको स्वीकार, कर्मपथी वह..... बल उसका जग हित के मद में,सपने भी करता साकार, कर्मपथी वह..... प्रेम सुधा छलकाने वाला,प्रेम ही है जिसका उपचार, कर्मपथी वह ...... खुशनसीब हूँ पाकर तुमको,कह कर तुमको अपना यार, कर्मपथी वह.... शरत चन्द्र(आधुनिक)

चन्द्र का पत्र

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चंद्र का पत्र सूर्य के नाम।                             स्थान:सौरमंडल                             समय:रात्रि मेरे प्यारे मित्र सूर्य,तुम्हारी बहुत याद आती है।मैं यहां आकाश में अपने समस्त तारागणों संग अत्यंत खुश हूं और आशा करता हूँ कि तुम भी सपरिवार अत्यंत खुश एवम स्वस्थ होंगे। मुझे याद है वो दिन जब मैं पृथ्वी बहन से रूठकर स्वयम को बर्बाद करने निकाला था और अपने जीवन के अंधेरों में खो गया था।तब तुमने ही मुझे अपनी मेहनत से कमाए हुए प्रकाश में से उधार देकर मेरी सहायता की और मुझे मेरी कक्षा  में पहुँचाकर मुझे आजीवन अपना ऋणी बना लिया।इसके पश्चात तुम्हारे द्वारा ही मुझे यह चंद्र नाम प्राप्त हुआ जिसके माध्यम से इस सौरमंडल में मुझे भी अस्तित्व मिला। मेरे प्यारे मित्र ,मैं सदैव आपके दर्शनों के लिए लालायित रहता हूँ।किन्तु मेरा job schedules कुछ ऐसा हो गया है कि जब मैं आपसे मिलने आता हूँ तब तक आप जा चुके होते हो।पृथ्वी बहन से बात होती है और उन्ही ...

अनुभूति का दंश!

अनुभूति तुम इस तरह  हो मेरे अंदर... तुम्हारे नाम के आँसू कण्ठ को भारी करते जाते... मैं होने देता हूँ भारी अपने कण्ठ को हालांकि तक़लीफ़ होती है बहुत तकलीफ.. उन आंसुओं को न बहने देने में...फिर भी नही बहने देता हूँ मैं उन आंसुओं को चाहता तो आ जाता बेफिक्र तुमसे मिलने; लेकिन अब नही आऊंगा कभी नही आऊँगा.... ये आँसु भारद्वाज के सरस्वती सदृश मुझे अन्याय करने से रोकते है। मैं किसी को कष्ट देकर तुम्हे अपने आप मे समाहित नही देख सकता अनुभूति.....!

प्रार्थना उनके आने की!

खुली छत,और अंधेरी रात तारों को टुकटुक देखता मैं नितांत अकेला इस जीवन-सफर में....तुम भी आओ ना। इंतजार कर रही रूह मेरी तुम्हारे रूह की..इस रूह की प्यास बुझाओ ना। अकेला ही सफर तय है हालांकि फिर भी कुछ पल के लिये ही मेरी रूह से तुम्हारे रूह को मिलाओ ना। आओ ना... या मौला मेरे शब्दों में इतनी ताकत दे,जो उन्हें छू सके उनकी प्रशांत चेतना को जगा सके। मैं मुकम्मल नही हूँ उनके बगैर उनका साथ मयस्सर करा दे मौला... फिर तू भी मुकम्मल और मैं भी मुकम्मल!

ख़त..७

बहुत ज्यादा मेरा रोम-रोम आपसे मिलने को आतुर हो रहा है। ये जानते हुए की अब मेरे नसीब में आपका साथ नही।इसके बावजूद आपके उत्पत्ति दिवस की असीम शुभकामनाएं। अब आपके भाग्य का सूर्योदय हो चुका है।प्रिय पत्थर!

तुम्हें कैसे भुलाऊँ--शरत चन्द्र(आधुनिक)

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कैसे तुम्हें भुलाऊँ? स्मृति तेरी भस्म मैं कर दूं ,खुद ही विस्मृत हो जाऊं? प्रश्न यही अब शेष हृदय में,कैसे तुम्हे भुलाऊँ? निर्झर बहती इन आंखो को क्या कहके बहलाऊँ? प्रश्न यही...... पिया हलाहल मंथन का था ,जग संरक्षा  हेतु, इस जग ने ही छीन लिया, मेरी नदिया का सेतु, नीलकंठ था लेकिन इस, विष को न मैं सह पाऊँ। प्रश्न यही अब....... इस पीड़ा की ज्वालाएं ये ,मेरा हृदय जलाएँ, वैरागी मन को भी ये ,मायाओं से भटकाए, ध्यानेश्वर मैं अब किस मद में, फिर से ध्यान लगाऊं? प्रश्न यही अब.... अपनों से ऐसे ही क्यों तुम ,रुठ गयी हे शक्ति! भूल गयी तुम  प्रियवर को और खुद भूली सी लगती, संबंधों के ये बंधन, अब मैं तो खोल न पाऊं। प्रश्न यही.......

शरत चन्द्र...

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नारी तुम हो जननी जग की,तुम ही तो जग माता हो, करुणा की झंकार तुम्ही हो,तुम ही प्रेम प्रदाता हो। तुमसे ही ये सृष्टि सारी,तुम विधना की छाया हो, शक्ति  तुम ब्रह्मांड की सारे,तुम ही सारी माया हो। तुमसे जग में  व्यापी ममता,तुम हो निर्मल कोई कविता, प्रेम तुम्हारी ही प्रतिछाया,फिर भी सहती जग -निर्ममता। तुम ही सीता, तुम सावित्री ,रानी लक्ष्मीबाई हो, तन मन का सब कल्मष धुलने,गंगा बनके आयी हो। दुर्गा काली रूप तुम्हारे ,जग में पूजित होते हैं, फिर क्यों मन मर्दानों के ,तेरे प्रति दूषित होते हैं। हे माँ ! हे भगिनी !हे भार्या !अब अन्याय न तुम सहना, कोई साथ न हो तब भी तुम इन सबसे लड़ते रहना। तेरी पावन छाया से ,ये जग पावन हो जाएगा, नर ,नारी को पूजेगा ,और नैतिक उन्नति पायेगा।

चंद्र प्रत्युत्तर!२

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मन तेरा ये रोता है क्यूं?हे यशोधरा सिद्धार्थप्रिया। मर गया तेरा सिध्दार्थ कहीं ,और जिया तो बस ये बुद्ध जिया। ये संग तेरा न रोक सका,उस प्राणप्रिय सुकुवांरे को, जीवन सब अपना सौंप दिया ,उसने जग के अंधियारे को। अन्याय कहो या छल बोलो ,जो चाहे तुम इस पल बोलो, गर शब्दों से न भरता मन, तो शीश झुकाकर तुम रो लो। वे वर तेरे ,दिनकर तेरे,जो प्राण से तुझको प्यारे हैं, जग को उज्ज्वल करते वे अब,अंधेरों के उजियारे हैं। सौतन तेरा वैराग नही ,मन का तेरा संताप ही है, आभा तेरी छीनी जिसने,वह विष रंजित यह सांप ही है। इस गरल से मन दूषित न करो ,मन से इसका प्रस्थान करो, अपने उस आत्म तत्व का तुम ,अब जग हित में उत्थान करो। ये त्याग तेरा जग को हरदम ,वह उज्ज्वल पथ दिखलायेगा, सब स्वार्थ त्याग जग हित मे ही,जीना सबको सिखलायेगा।