चंद्र प्रत्युत्तर!२
मन तेरा ये रोता है क्यूं?हे यशोधरा सिद्धार्थप्रिया।
मर गया तेरा सिध्दार्थ कहीं ,और जिया तो बस ये बुद्ध जिया।
ये संग तेरा न रोक सका,उस प्राणप्रिय सुकुवांरे को,
जीवन सब अपना सौंप दिया ,उसने जग के अंधियारे को।
अन्याय कहो या छल बोलो ,जो चाहे तुम इस पल बोलो,
गर शब्दों से न भरता मन, तो शीश झुकाकर तुम रो लो।
वे वर तेरे ,दिनकर तेरे,जो प्राण से तुझको प्यारे हैं,
जग को उज्ज्वल करते वे अब,अंधेरों के उजियारे हैं।
सौतन तेरा वैराग नही ,मन का तेरा संताप ही है,
आभा तेरी छीनी जिसने,वह विष रंजित यह सांप ही है।
इस गरल से मन दूषित न करो ,मन से इसका प्रस्थान करो,
अपने उस आत्म तत्व का तुम ,अब जग हित में उत्थान करो।
ये त्याग तेरा जग को हरदम ,वह उज्ज्वल पथ दिखलायेगा,
सब स्वार्थ त्याग जग हित मे ही,जीना सबको सिखलायेगा।
मर गया तेरा सिध्दार्थ कहीं ,और जिया तो बस ये बुद्ध जिया।
ये संग तेरा न रोक सका,उस प्राणप्रिय सुकुवांरे को,
जीवन सब अपना सौंप दिया ,उसने जग के अंधियारे को।
अन्याय कहो या छल बोलो ,जो चाहे तुम इस पल बोलो,
गर शब्दों से न भरता मन, तो शीश झुकाकर तुम रो लो।
वे वर तेरे ,दिनकर तेरे,जो प्राण से तुझको प्यारे हैं,
जग को उज्ज्वल करते वे अब,अंधेरों के उजियारे हैं।
सौतन तेरा वैराग नही ,मन का तेरा संताप ही है,
आभा तेरी छीनी जिसने,वह विष रंजित यह सांप ही है।
इस गरल से मन दूषित न करो ,मन से इसका प्रस्थान करो,
अपने उस आत्म तत्व का तुम ,अब जग हित में उत्थान करो।
ये त्याग तेरा जग को हरदम ,वह उज्ज्वल पथ दिखलायेगा,
सब स्वार्थ त्याग जग हित मे ही,जीना सबको सिखलायेगा।

Comments