मुकम्मल-विछोह!(एक प्रेम कथा)

पहली मुलाकात तो यूँही हो गयी,अकस्मात राह चलते-चलते..उसके बाद इश्क़ की शुरुआत हुई।
दिन-रात बाते होने लगी प्रेम-प्रचण्ड हो गया..
 आनन्दी ने एक दफ़ा पूछ ही लिया मुझसे,"तुमने मुझमे क्या देखा शिवेश! जो मैं इतना भा गयी तुम्हे?"
मैंने कहा,"माँ, एक ऐसी माँ जो विवेकानंद को जन सके।"
आनंदी एक-टक मुझे देखने लगी।
आनन्दी की दिव्यता को भांप-कर ही मैंने ये जवाब दिया था।
अब चुकि सामाजिक अभियंत्रिकी में मेरा और आनन्दी का मिलन सम्भव नही था अज्ञात कारणों से।
हम दोनों पुनः अजनबी हो गए।
कुछ विछोह बीत जाने के बाद एक दिन किताब की दुकान पर आनन्दी ने मुझसे पूछा,"अब विवेकानंद का जन्म कैसे होगा?"
मैंने कहा,"विवेकानंद को जन्मने देने के लिए वीर्य की और गर्भाशय की आवश्यकता भी नही एक संकल्प की आवश्यकता होती है जो आप में है।"
तदुपरांत शिवेश,आनन्दी को निहार खूब रोया,
उसे मालूम था कि आनन्दी सब बर्दाश्त कर सकती है किंतु शिवेश का रूदन नही।
फिर शिवेश अपनी एकांत दुनिया मे चला गया।
आनन्दी अपने घर गई.. शिवेश के दिये सारे तोहफों को अपने उर से लगा कर कमरा बन्द कर खूब रोई...
ये कैसा विछोह है जो मुकम्मल भी है और अधूरा भी है



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