तुम्हें कैसे भुलाऊँ--शरत चन्द्र(आधुनिक)

कैसे तुम्हें भुलाऊँ?
स्मृति तेरी भस्म मैं कर दूं ,खुद ही विस्मृत हो जाऊं?
प्रश्न यही अब शेष हृदय में,कैसे तुम्हे भुलाऊँ?

निर्झर बहती इन आंखो को क्या कहके बहलाऊँ?
प्रश्न यही......

पिया हलाहल मंथन का था ,जग संरक्षा  हेतु,
इस जग ने ही छीन लिया, मेरी नदिया का सेतु,
नीलकंठ था लेकिन इस, विष को न मैं सह पाऊँ।
प्रश्न यही अब.......

इस पीड़ा की ज्वालाएं ये ,मेरा हृदय जलाएँ,
वैरागी मन को भी ये ,मायाओं से भटकाए,
ध्यानेश्वर मैं अब किस मद में, फिर से ध्यान लगाऊं?
प्रश्न यही अब....

अपनों से ऐसे ही क्यों तुम ,रुठ गयी हे शक्ति!
भूल गयी तुम  प्रियवर को और खुद भूली सी लगती,
संबंधों के ये बंधन, अब मैं तो खोल न पाऊं।
प्रश्न यही.......

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