काली
तुम काली जैसी जिद पर थी
मैं बस विष्णु-सा बन बैठा था...
जब मैं शंकर बन लौट आया
तेरी ममता को छोड़ आया।
अब छोड़ तुम्हारा ज़िद्दीपन
मुझको अपनापन स्मृति होता...
एक सूर्य चला-सा अनवरत
एक भाल चूम के दिवंगत।
एक यक्ष प्रश्न प्रताड़ित करता उर को
किस नेत्र से तुमको देखूंगा।
हा आँख मूंद लूंगा मैं प्रिय
हा राह त्याग दूंगा मैं प्रिय!
मैं बस विष्णु-सा बन बैठा था...
जब मैं शंकर बन लौट आया
तेरी ममता को छोड़ आया।
अब छोड़ तुम्हारा ज़िद्दीपन
मुझको अपनापन स्मृति होता...
एक सूर्य चला-सा अनवरत
एक भाल चूम के दिवंगत।
एक यक्ष प्रश्न प्रताड़ित करता उर को
किस नेत्र से तुमको देखूंगा।
हा आँख मूंद लूंगा मैं प्रिय
हा राह त्याग दूंगा मैं प्रिय!

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