चन्दरलेख..२

संध्या में ढलता  सूरज,संकल्प दिवस का लेता है,
तम की जड़ता से लड़ लड़ कर,एक नया सवेरा देता है।

यदा कदा जब मेघ सभी,आभा इसकी हर लेते हैं,
रोक किरण को इसकी वे ,अश्कों की वर्षा देते हैं।

इस विषम घड़ी में दिनकर ये ,तनिक नही घबराता है,
चीर मेघ के उर को ये ,पथ अपना पुनः बनाता है।

चलता रहता है प्रतिपल ये,पथ से न डिगने पाता है,
संकल्पों संग जीना ही ,सूरज हमको सिखलाता है।

तेरी आभा से चंद्र भी ये ,फिर दीप्तियुक्त हो जाता है,
चलते रहना पथ पर अपने ,संकल्प यही दोहराता है।

संकल्प ही हैं इच्छाशक्ति,ये ही उन्नति के 'राज़ 'हैं,
एक बार अगर ये सध जाए,न रुकता कोई काज है।

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