चन्द्र-लेख(मित्रता)
मेरा पहला लेख
**************
मेरे प्यारे मित्रों,आधुनिक चंद्र नाम से कविताएं लिखते लिखते जीवन मे संतृप्तता आ गयी थी,सोचा क्यों न गद्य में भी हाथ आजमाया जाए।वस्तुतः इसकी प्रेरणा मेरे अद्यतन मित्र ने ही दी और वे मेरा कोई लेख पढ़ने के इच्छुक भी थे अतः मैने भी सोचा कि श्री गणेश कर ही देना चाहिए।काफी सोच विचार किया कि किस विषय पर लिखूं सांसारिक,आध्यात्मिक,राजनीतिक,इह लौकिक या पारलौकिक।असंख्य विषय मस्तिष्क में दंगल मचाने लगे।फिर एक निर्णायक की भांति आकर मेरे मस्तिष्क ने इस दंगल को रोका, जो अब दंगल कम उलझन ज्यादा प्रतीत हो रहा था।फिर अचानक मस्तिष्क ने ही फुसफुसाकर कहा-मित्र ने प्रेरित किया है तो मित्रता पर ही क्यों नही लिखता।क्यों बेवजह राई का पहाड़ बना रहा है। तो ये कहानी है मेरे विषय चयन की।
विषय तो चुन लिया -मित्रता।लेकिन क्या मित्रता पर कुछ नया है लिखने के लिए मेरे पास।अनेक मनीषि गण तो पहले ही इस शीर्षक का पोस्ट मार्टम कर चुके हैं ।सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को तो उधेड़ उधेड़ कर सामने रखा गया है उनके द्वारा ।अब यही सोच रहा था कि कुछ बचा नही है लिखने को इस विषय पर तो रहने ही देता हूँ।तभी कुछ विचार अचानक से प्रकट हुए हृदय में और लिखने के लिए प्रेरित करने लगे।मैं आधुनिक चंद्र हूँ तो क्यों न आधुनिक मित्रता के विषय में ही लिखूं?अब निश्चित हो गया था कि मुझे आधुनिक मित्रता के विषय में अपने सम्पूर्ण अनुभवों को इस लेख में उड़ेल देना है ।लेकिन ये क्या मैं तो एक शब्द भी नही लिख पाया।ये क्या हो गया ?कहाँ गए वे अद्वितीय विचार जो अभी थोड़ी देर पहले बहुत उछल कूद कर रहे थे?मैं परेशान होकर किसी भी प्रकार से कुछ पंक्तियों की शुरुआत करना चाह रहा था लेकिन असफल रहा।पराजित सा अपनी लेखनी को धिक्कार रहा था कि क्या हो गया है तुझे ,मित्रता पर एक शब्द नही है लिखने के लिए तेरे पास।मेरे मस्तिष्क ने भी ,जो अभी तक बहुत बड़ा सलाहकार बना हुआ था ,चुप्पी साध ली थी।मैं अंदर ही अंदर उधेड़बुन में लगा हुआ था ,तभी हंसते-खिलखिलाते मेरे हृदय ने कहा -मित्र ,मित्रता लिखने का नही जीने का विषय है।उठ और जा जी ले अपनी मित्रता को।ये आवाज़ें सुनकर मुझे ddlj में अमरीश पुरी का वह डायलॉग याद आ गया-जा सिमरन जा.....।वाकई मित्रता लिखी नही जा सकती ।ये तो जीवन ही है जो रूप बदल कर मित्रों के रूप में हमें हंसाने रुलाने ,गुदगुदाने,रूठने और मनाने के लिए आ धमकता है।यही तो है मित्रता।भला जीवन को शब्द कहां तक वर्णित कर सकते हैं।अतः मैं चला अपनी मित्रता जीने ,आप को भी फुरसत मिल जाये तो जरूर जी कर देखिएगा इस मित्रता को ,बहुत सुकून मिलता है।धन दौलत ,शोहरत कमाने वाले कइयों को देखा है लेकिन मित्रता कमाने वाला कोई विरला ही होता है। (ब्रह्मांड मित्र ये पंक्तियां आप को समर्पित )
**************
मेरे प्यारे मित्रों,आधुनिक चंद्र नाम से कविताएं लिखते लिखते जीवन मे संतृप्तता आ गयी थी,सोचा क्यों न गद्य में भी हाथ आजमाया जाए।वस्तुतः इसकी प्रेरणा मेरे अद्यतन मित्र ने ही दी और वे मेरा कोई लेख पढ़ने के इच्छुक भी थे अतः मैने भी सोचा कि श्री गणेश कर ही देना चाहिए।काफी सोच विचार किया कि किस विषय पर लिखूं सांसारिक,आध्यात्मिक,राजनीतिक,इह लौकिक या पारलौकिक।असंख्य विषय मस्तिष्क में दंगल मचाने लगे।फिर एक निर्णायक की भांति आकर मेरे मस्तिष्क ने इस दंगल को रोका, जो अब दंगल कम उलझन ज्यादा प्रतीत हो रहा था।फिर अचानक मस्तिष्क ने ही फुसफुसाकर कहा-मित्र ने प्रेरित किया है तो मित्रता पर ही क्यों नही लिखता।क्यों बेवजह राई का पहाड़ बना रहा है। तो ये कहानी है मेरे विषय चयन की।
विषय तो चुन लिया -मित्रता।लेकिन क्या मित्रता पर कुछ नया है लिखने के लिए मेरे पास।अनेक मनीषि गण तो पहले ही इस शीर्षक का पोस्ट मार्टम कर चुके हैं ।सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को तो उधेड़ उधेड़ कर सामने रखा गया है उनके द्वारा ।अब यही सोच रहा था कि कुछ बचा नही है लिखने को इस विषय पर तो रहने ही देता हूँ।तभी कुछ विचार अचानक से प्रकट हुए हृदय में और लिखने के लिए प्रेरित करने लगे।मैं आधुनिक चंद्र हूँ तो क्यों न आधुनिक मित्रता के विषय में ही लिखूं?अब निश्चित हो गया था कि मुझे आधुनिक मित्रता के विषय में अपने सम्पूर्ण अनुभवों को इस लेख में उड़ेल देना है ।लेकिन ये क्या मैं तो एक शब्द भी नही लिख पाया।ये क्या हो गया ?कहाँ गए वे अद्वितीय विचार जो अभी थोड़ी देर पहले बहुत उछल कूद कर रहे थे?मैं परेशान होकर किसी भी प्रकार से कुछ पंक्तियों की शुरुआत करना चाह रहा था लेकिन असफल रहा।पराजित सा अपनी लेखनी को धिक्कार रहा था कि क्या हो गया है तुझे ,मित्रता पर एक शब्द नही है लिखने के लिए तेरे पास।मेरे मस्तिष्क ने भी ,जो अभी तक बहुत बड़ा सलाहकार बना हुआ था ,चुप्पी साध ली थी।मैं अंदर ही अंदर उधेड़बुन में लगा हुआ था ,तभी हंसते-खिलखिलाते मेरे हृदय ने कहा -मित्र ,मित्रता लिखने का नही जीने का विषय है।उठ और जा जी ले अपनी मित्रता को।ये आवाज़ें सुनकर मुझे ddlj में अमरीश पुरी का वह डायलॉग याद आ गया-जा सिमरन जा.....।वाकई मित्रता लिखी नही जा सकती ।ये तो जीवन ही है जो रूप बदल कर मित्रों के रूप में हमें हंसाने रुलाने ,गुदगुदाने,रूठने और मनाने के लिए आ धमकता है।यही तो है मित्रता।भला जीवन को शब्द कहां तक वर्णित कर सकते हैं।अतः मैं चला अपनी मित्रता जीने ,आप को भी फुरसत मिल जाये तो जरूर जी कर देखिएगा इस मित्रता को ,बहुत सुकून मिलता है।धन दौलत ,शोहरत कमाने वाले कइयों को देखा है लेकिन मित्रता कमाने वाला कोई विरला ही होता है। (ब्रह्मांड मित्र ये पंक्तियां आप को समर्पित )
Comments