हे प्रिय

तुम क्यों मुझको
मेरी ही स्मृति में आकर
मेरी तन्हाई का
एहसास दिलाती रहती हो।।

मेरी सिद्दतता भरी मोहब्बत का
मजाक बनाती रहती हो,
जब मैंने है छोड़ दिया...
तुमको तुम्हारी मर्जी पर।।

यादों में आकर मुझको
क्यों सताती रहती हो।
तुम क्यों मुझको याद दिला कर
कष्ट-रात्रि देती हो।

है निवेदन हे प्रिय! तुमसे
मुझको तन्हा चलने दो..
जग-विस्मृत कर जग के
ख़ातिर मुझको उद्दम करने दो।

छोड़ दिया तुमने मुझको जब
यादों में भी आओ ना,
रोम-रोम परिमार्जित करके
अपनी धूनी रमाओ ना...

मैं तो निकल चुका उस दिन ही
जिस दिन माथे पर आपके
चुम्बन अर्पित कर निकला था...

हे प्रिय हर जगह से मुक्त कर मुझे
कैवल्य-कामी बनाओ न....
ढाई अक्षर प्रेम का सखी
मुझको तुम समझाओ ना।

हे प्रिय यादो-से मुझको
कुक्कर की तरह दुर्दुराओ! ना! हे प्रिय!


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