अनुभूति का दंश!

अनुभूति तुम इस तरह
 हो मेरे अंदर...
तुम्हारे नाम के आँसू
कण्ठ को भारी करते जाते...

मैं होने देता हूँ
भारी अपने कण्ठ को
हालांकि तक़लीफ़ होती है
बहुत तकलीफ.. उन आंसुओं को
न बहने देने में...फिर भी नही
बहने देता हूँ मैं उन आंसुओं को

चाहता तो आ जाता बेफिक्र तुमसे
मिलने; लेकिन अब नही आऊंगा
कभी नही आऊँगा....
ये आँसु भारद्वाज के सरस्वती सदृश
मुझे अन्याय करने से रोकते है।

मैं किसी को कष्ट देकर
तुम्हे अपने आप मे समाहित नही
देख सकता अनुभूति.....!


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