शरत चन्द्र...१

मैं नाविक जीवन नौका का,कर्म मेरी पतवार है,
भावुकता है नदिया मेरी,जिसमे बहता प्यार है।

नौका मेरी सुख दुख सहती, आगे बढ़ती रहती है,
प्रेम सुधा के पावन जल में,खूब हिलोरे भरती है।

कर्मों की पतवार मेरी ,जीवन नौका को खेती है,
नितप्रति आगे पीछे होती,पर विश्राम न लेती है।

लक्ष्य सदा इसका है ,दिनकर की किरणों के संग चलना,
रात्रि कालिमा ले आये तो,चंद्र को ही थामे बढ़ना।

उद्वेलित ये नदी, सदा न यूँ ही यहां ठहरती है,
पीड़ा के तूफानों से,ये दूभरतायें भरती है।

ऐसे में क्या उचित रहेगा,मेरा पीछे हट जाना,
मन को अपने छोटा करके,मैं निर्बल हूँ रट जाना।

मैं तो हूँ शून्य का अंशी, जिसमें कोई रार नही,
जो इससे भिड़ जाए तो फिर ,उसका बेड़ा पार नही।

धवल ज्योति से सराबोर हो ,प्रेम गीत मैं गाऊंगा,
जीवन की नौका को ,दरिया पार वहाँ ले जाऊंगा।

जहाँ सदा रहता है निकला, आशाओं का वह दिनकर,
सिखलाता जो बढ़ते रहना ,अपने जीवन के पथ पर ।

आभा लेकर उसकी मैं ,अंधेरों को चमकाऊँगा,
प्रेरित होकर उनसे,अब मैं धवल चंद्र बन जाऊंगा।

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