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प्रवाह!

लेखन सहजता से ही हो पाता है! आप जब विश्रांति में होते है तभी कुछ लिख पाते है! कई दिनों से या ये कहिये महीनों बाद थोड़ी सी विश्रांति मिली मुझे। आगे..... अब शायद लेखन अनवरत चले कुछ दिनों तक।

मैं आऊंगा!

मैं आऊंगा, मुक्त होकर तुमसे मिलने! तुम प्रतीक्षारत हो! ज्ञात है मुझे! अभी बोझ है सिर पर अभी मिलन मिलन जैसा न होगा! अभी मैं विसर्जित नही हुआ है अभी तमस से युक्त हूँ! निशा तेरी वेदना का ज्ञान है मुझको उम्र है मेरी जलन की नित निरन्तर अनवरत! उम्र की संध्या में तुममे एक होना है मुझे! उम्र की.... आऊँगा मैं तेरे चरणों की धूल बनने तुझपे मर मिटने! आऊँगा,ये निश्चित है। मिलन हमारा शाश्वत है।। तुम्हे महसूस करता हूँ अधूरी साँस में मैं नित्य इन साँसों के पूर्ण होने तक मैं आऊंगा खुदको मिटाकर! आऊँगा,अभी संसार छट रहा है अभी आलोक की प्रतिबद्धता है निशा में मिल के मुझको... है करनी उम्र पूरी! कहानी चल रही है जन्म नही अब शेष है! ग्लानि नही है रंच मात्र तुम समझोगे मुझको।। यकीं है मुझे! तुम्हारे द्वार पर दस्तक दूंगा मैं, हा आऊंगा मैं!

अदिती

बुदबुदाहट हो रही है आहिस्ता आहिस्ता बर्फ पानी हो चुका है भाप भी हो जाएगा! ताप की दुनिया, निरन्तर हो चली वर्तुल भयंकर तुम क्या समझोगे बगावत प्यार में होता है क्या! जिंदगी है नित-निरन्तर अनवरत आवेग में... कही है फ़ैलाव-सी ये कही एक सिकुड़ाव है.. या कही  है एक दलदल मच रही है रोज हलचल मैं हुआ अब मौन तुमसे कुछ नही कहना हमे जो भी कहना था हमे हम कह चुके तुमसे...हे प्रियतम! भाग्य को है अब नमन हाँ भाग्य को है अब नमन! अब न कोई काश है अब न कोई आश है दुख की या संघर्षों की रजनी से देखो पार हुआ पतवार मिला,पतवार मिला आया प्रभात आया प्रभात सन्ध्या का मुझको ज्ञान हुआ ये प्रखर रश्मि कुछ पल की है रजनी अखण्ड अनवरत रही अस्तित्व इसी से है सबका फिर क्यों प्रभा से दूर रही?.......... सत्य है प्रिय इस निरन्तर धार की अद्विती हो तुम! किन्तु दुनिया की रीति रही है कुछ ऐसी जो प्रत्यक्ष नही होने देती! तुम ही समझो श्रेय है ये जगत ये समझे न समझे पत्र की भी पात्रता मैं खो चुका हे! मेरे प्रियवर! जब द्वय ही नही रहा है शेष! संसार का मैं अभिषेश! कैसे कविता सम्पूर्ण करूँ मैं छं...

अब बस!

काश कि कोई "काश"होता! दरम्यान हमारे तुम्हारे! किन्तु अब आस भी नही तो "काश!" कैसे होगा! हा अनन्त हो तुम अब मुझमे साथ नही है बस ये जानो! सत्य ये भी है कि मेरी पात्रता भी नही है साथ की! और अब......बिखरा हुआ-सा मैं न जाने कितने चेहरे गुजरे हैं मुझसे होकर! न जाने कौन-से रास्ते होंगे न जाने कौन सी मंज़िल होगी! तुम हो! तुम रहोगी मुझमे! एक द्वीप जैसे रहता है सागर में ही किन्तु जुदा-जुदा! न जाने तुम कौन थी न जाने राह कौन थी! मै तो गया ! मय में हु मैं भय नही है कोई लय में हूँ मै न राधा न रुक्मिणी कोई नही मिली मैं तो मीरा के संग हो चला! नही मैं कृष्ण न ही मैं राम! अदना-सा आदम! जाओ तुम दूर इस सागर से द्वीप काश की कोई अगस्त होता जो द्वीप को मुकम्मल कर देता!

माँ

कोई नही आएगा तुम्हारे पास,कोई भी नही, ये हो सकता है कि तुम्हे लगे कि एक भीड़ गुजर रही है तुम्हारे इर्दगिर्द.... उन्हें अपना मत समझना,अपना समझने की भूल मत करना!ये आवागमन जारी रहेगा आत्मतत्व से सभी एक ही पेड़ के पत्ते हैं! वो पत्ते जो कभी मिलते नही एक दूसरे से उनका काम है बहना! हवाओं के साथ ,उनका काम है झूमना फिज़ाओं के साथ! तुम भी झूमो तुम भी चूमो माँ है सृष्टि ! माँ है शक्ति माँ ही सारा जीवन है! रक्त कणों में बहता समय है! और समय ही आत्मा है!