अदिती

बुदबुदाहट हो रही है
आहिस्ता आहिस्ता
बर्फ पानी हो चुका है
भाप भी हो जाएगा!
ताप की दुनिया, निरन्तर
हो चली वर्तुल भयंकर

तुम क्या समझोगे बगावत
प्यार में होता है क्या!
जिंदगी है नित-निरन्तर
अनवरत आवेग में...
कही है फ़ैलाव-सी ये
कही एक सिकुड़ाव है..
या कही  है एक दलदल
मच रही है रोज हलचल

मैं हुआ अब मौन तुमसे
कुछ नही कहना हमे
जो भी कहना था हमे
हम कह चुके तुमसे...हे प्रियतम!
भाग्य को है अब नमन
हाँ भाग्य को है अब नमन!
अब न कोई काश है
अब न कोई आश है
दुख की या संघर्षों की
रजनी से देखो पार हुआ
पतवार मिला,पतवार मिला
आया प्रभात आया प्रभात
सन्ध्या का मुझको ज्ञान हुआ
ये प्रखर रश्मि कुछ पल की है
रजनी अखण्ड अनवरत रही
अस्तित्व इसी से है सबका
फिर क्यों प्रभा से दूर रही?..........

सत्य है प्रिय इस निरन्तर धार की
अद्विती हो तुम!
किन्तु दुनिया की रीति रही है कुछ ऐसी
जो प्रत्यक्ष नही होने देती!
तुम ही समझो श्रेय है ये
जगत ये समझे न समझे
पत्र की भी पात्रता मैं खो चुका हे! मेरे प्रियवर!

जब द्वय ही नही रहा है शेष!

संसार का मैं अभिषेश!
कैसे कविता सम्पूर्ण करूँ मैं छंदों के लयबन्धन में!
अभिनंदन है! अभिनंदन है! अभिनंदन है, अभिनंदन है।


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