Posts

Showing posts from December, 2017

इति समापन:

दरअसल मैं अनिश्चितता में ही जीता आया हूँ,और अनिश्चितता ही प्रकृति की प्रकृति है,तुम्हारा प्रेम मुझे बहुत गहराइयों में ले जाता था,किन्तु वो एक बन्धन था और बन्धन शायद मेरी प्रकृति नही,इसलिए चूंकि आप अपने अहंकार को त्याग नही सकती मुझे ये बन्धन त्यागना पड़ा, और मैं पुनः निर्ग्रन्थ हो गया,मुझे उस रास्ते पर ही चलना है,जो रास्ता अंतरतम से दिखाई देता है,और आपके साथ मुझे चलने में तकलीफ हो रही थी क्योंकि आपका और मेरा नजरिया भिन्न है,और सायद मेरे इस फैसले से परम्परा कि भी रक्षा हो,अतः मैं आपसे विदा लेता हूं,अब ईश्वर कभी यदि मिलाये तो बिलकुल नया प्रभाकर मिलेगा आपको,जिससे आपकी मुलाकात हुई थी वो नही!  इसमे मैं कुछ नही कर सकता क्योंकि मुझे अपने अंतरात्मा का साथ देना है,या शायद यही मेरी गति हो! मुझे आपसे बहुत कुछ मिला जिनको मैं शब्दों से नही वर्णित कर सकता हूँ! आप मेरे हृदय में अधिस्थित है,आपको कोटि कोटि धन्यवाद!

अपरिचित

यूँ तो प्रेम बन्धन में डालता है किन्तु तुम किस देश के वासी हो, सांवरे नही न हो, की तुम्हारी छांव बहुत अद्भुत है, वासना का कोई प्रश्न नही किन्तु तुम किस देश के वासी हो, क्या सीखे कहाँ पले कहाँ बढ़े कि तुम्हारे छांव में सारे बन्धन खुलते है धीरे धीरे, कल तुम जो भी रहो, या मै मैं न रहूँ किन्तु मेरी स्मृतियों में तुम हमेशा वैसे ही रहोगे जैसे तुम्हारी स्मृति में तुम्हारी माँ की यादें है; तुम्हारा सब कुछ मेरे खजाने को भरता जाता है,जबकि मैं भी लुटाने ही चला हूँ, फिर भी तुम किस देश के वासी हो; कहते है कि कुछ लोग बड़े विशिष्ट होते है,तुम मेरे लिए उस कृष्ण का रूप हो,तुम  कही भी रहो तुम मुझसे अलग नही हो, बस मैं उस योगेश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि वो मेरे और तुम्हारे संबधो को और पवित्र करे एवं उसकी रक्षा करें!

विरोधी परिवर्तन!...जड़त्व!

उस क्रिया को घटे हुए कुछ कुछ करके ज्यादा दिन होते जा रहे हैं किंतु वो घटना और गहरी होती जा रही है,और उस वक़्त मुझे चरित्र शून्यता का एहसास इस कदर हुआ कि मैं बिल्कुल बदल गया! बल्कि जो होना था वो हो गया! उसके लिये हांलाकि मैं ईश्वर को धन्यवाद देता रहता हुँ पर तुम्हारा व्यग्र व्यवहार मुझे आत्मग्लानि की ओर अग्रसर करता है। हांलाकि आज नही तो कल,कल नही तो परसों तुम्हे भी एहसास होगा कि प्रकृति में जो भी होता है वो या तो प्रायिकता या सम्भावना का द्योतक होता है;फिर भी मानवीय नैतिकता मुझे फटकारती है! और मैं बिल्कुल शांत चित्त होकर उसकी उलाहना सुन लेता हूं क्योंकि मुझे विश्वास है कि तुम्हे भी एहसास होगा और वो दिन मेरे लिये संतुष्टि एवं सन्तुलन का दिन होगा। ईश्वर को कोटि कोटि प्रणाम! एवं धन्यवाद!

निरन्तर

देखता हूं मैं भी ढूंढता हूँ मैं भी एक किसी को जिससे पहचान हो जिसको पहचान हो ...दिखता है मुझे एक खूबसूरत सा अब! डूबना भी नही है और छोड़ना भी नही है, यही सफर है बस अब ही का एक तरंग निकले मुझसे जो छू जाए सबके अनछुए एहसास को एक ख्वाब को जो ख्वाब भी है और पूरा भी हो रहा है!