विरोधी परिवर्तन!...जड़त्व!

उस क्रिया को घटे हुए कुछ कुछ करके ज्यादा दिन होते जा रहे हैं किंतु वो घटना और गहरी होती जा रही है,और उस वक़्त मुझे चरित्र शून्यता का एहसास इस कदर हुआ कि मैं बिल्कुल बदल गया! बल्कि जो होना था वो हो गया!
उसके लिये हांलाकि मैं ईश्वर को धन्यवाद देता रहता हुँ पर तुम्हारा व्यग्र व्यवहार मुझे आत्मग्लानि की ओर अग्रसर करता है।
हांलाकि आज नही तो कल,कल नही तो परसों तुम्हे भी एहसास होगा कि प्रकृति में जो भी होता है वो या तो प्रायिकता या सम्भावना का द्योतक होता है;फिर भी मानवीय नैतिकता मुझे फटकारती है! और मैं बिल्कुल शांत चित्त होकर उसकी उलाहना सुन लेता हूं क्योंकि मुझे विश्वास है कि तुम्हे भी एहसास होगा और वो दिन मेरे लिये संतुष्टि एवं सन्तुलन का दिन होगा।
ईश्वर को कोटि कोटि प्रणाम! एवं धन्यवाद!

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