इति समापन:

दरअसल मैं अनिश्चितता में ही जीता आया हूँ,और अनिश्चितता ही प्रकृति की प्रकृति है,तुम्हारा प्रेम मुझे बहुत गहराइयों में ले जाता था,किन्तु वो एक बन्धन था और बन्धन शायद मेरी प्रकृति नही,इसलिए चूंकि आप अपने अहंकार को त्याग नही सकती मुझे ये बन्धन त्यागना पड़ा, और मैं पुनः निर्ग्रन्थ हो गया,मुझे उस रास्ते पर ही चलना है,जो रास्ता अंतरतम से दिखाई देता है,और आपके साथ मुझे चलने में तकलीफ हो रही थी क्योंकि आपका और मेरा नजरिया भिन्न है,और सायद मेरे इस फैसले से परम्परा कि भी रक्षा हो,अतः मैं आपसे विदा लेता हूं,अब ईश्वर कभी यदि मिलाये तो बिलकुल नया प्रभाकर मिलेगा आपको,जिससे आपकी मुलाकात हुई थी वो नही! 
इसमे मैं कुछ नही कर सकता क्योंकि मुझे अपने अंतरात्मा का साथ देना है,या शायद यही मेरी गति हो!
मुझे आपसे बहुत कुछ मिला जिनको मैं शब्दों से नही वर्णित कर सकता हूँ!
आप मेरे हृदय में अधिस्थित है,आपको कोटि कोटि धन्यवाद!

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