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Showing posts from July, 2018

नीर

समय? ये भी कोई चीज है एक मुसाफिर जा रहा है... और कहीं पे आ रहा है बीच मे है कुछ नही बस संगी-साथी मरहमी हैं किन्तु है ठहरा नही कुछ चल रही है ये फिजा... क्यों है? किसको है पता.. कुछ लिखावट ऐसी है जो बाद में समझूंगा मैं मैं नही समझा रहा पदचिह्न छोड़े जा रहा।। राह में है कुछ मुसाफिर ऐसे भी मुझको मिले.. वो मिले या न मिले ये और बात है...पर मैं? मिले और गले मिले जा रहा आनन्द मिलन के गीत गाते जा रहा।। सदियों से कइयो ने लिखी है अधूरी दास्तां... मैं भी कोशिश में हूँ कि... इक पूरी तो कर जाऊं यहाँ... ज़िद ये पूरी हो गयी. नज़रे मिली जिस दिन मिरी.. तुमको हो या हो न ये एहसास मुझको हो गया रास्ते का एक मुसाफिर रास्ते में खो गया.... तुमको पीया है मेरी नज़रो ने इतना हे प्रिये हर तरफ श्रृंगार का मंजर मुझे दिखने लगा खो दिया हूँ इश्क़ में सारी जमा पूंजी यहाँ पा लिया नयनों में तेरे पल में ही सारा जहाँ... माना मैंने धीर की,तुझमे कमी कोई नही मैंने भी तो धीर का निर्माण है छोड़ा नही प्रिय-मिलन में कोई भी हो पथ मुझे मंज़ूर है तुमपे कोई आंच आये ऐसा हो सकता नही रिश्ता ये जन्मो...

ऐ-ज़िन्दगी!

ज़िन्दगी अप्रतिम है.. बीत जाती है, समझ नही आती कहीं दूर-दूर तक यातनाओं और पीड़ा का सफर कहीं बर्फ के तीखे एहसास-सी समझ आती है... समझ, ज़िन्दगी और उलझन ये तीनों घनिष्ठ मित्र हैं.... जैसे-जैसे समझ बढ़ी ज़िन्दगी घनीभूत हुई और फिर उलझनों का अपार संसार विस्तृत होता है... सत्य सदियों से वैरागी रहा है झूठ सदियों से भोग के जकड़न में रहता है किन्तु दुर्भाग्य ये है कि झूठ ने सत्य को कैद कर दिया है... सत्य को प्रताड़ित किया है... झूठ के पास वस्त्र होते हैं... सत्य निर्वस्त्र होता है.... इसलिये जब भी सत्य झूठ के मोहल्ले से होकर गुजरा...झूठ ने उसे असामाजिक घोषित करके उसके पांवों में बेड़ियाँ डलवाया मारा-पीटा सूली पर चढ़ाया.. अधिकतम ज़िंदगियाँ मुझे सरकारी कार्यालयों की धूल से चिपटी-लिपटी ज़िल्द-सी ही दिखती हैं... ज़िन्दगी तू सचमुच एक रहस्य है रहस्यों का रहस्य हैं! और ऐ-ज़िन्दगी तूने सत्य को इतना अकेला क्यों कर दिया!

काला जादूगर

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वो शायद प्रेम से तबतक न परिचित रही हो मैंने ही उसे प्रेम करना सिखाया.. प्रेम की एक-एक सूक्ष्म सत्ता से उसका परिचय कराया। हम दोनों में कौन ज्यादा समझदार है ये बात अभीतक अज्ञात है हम दोनों ने साथ-साथ शादी के हसीन ख्वाब देखे एक वादियों भरी बस्ती में घर बसाने के ख्वाब देखे.... ऐसे ही वक़्त गुजरता जा रहा था हम इश्क़ का रसपान कर रहे थे पूरी दुनिया को भुलाकर... इसी प्रवाह में एक दिन हमदोनों से सफर में एक भूत मिला बहुत बुरे हालात लग रहे थे उसके,किन्तु था वो बहुत शक्तिशाली....... वो एक काला जादूगर था और बहुत निर्दयी भी था उसके साथ के प्रारंभ से ही हमारा प्रेम घृणा का रूप लेता गया और एक दिन हमे बिछड़ना पड़ा हम अब एक दूसरे की शक्ल तक नही देखते बात-चित तो दूर की बात है... हा हमारी तन्हाई में वो भूत हमारे साथ रहता है.. वो भूत है समाज!

रिश्तों की समझ!

सचमुच हर रिश्ते की एक उम्र होती है... वैसे ये भ्रम रहता है रिश्तों को अबाध और अनन्त होने का किन्तु......ये मात्र भ्रम है... जब दो मिलते हैं तब रिश्ते बनते है एक  नाम मिल जाता है प्रत्येक रिश्ते को..... फिर इसे सच्चे और झूठे के तराजू पर तौला जाता है.... परन्तु सच्चे रिश्ते तो आसमान में बनते हैं और आसमानी रिश्ते हमे आमतौर पर नही दिखते हैं। इसका मूल वजह जानना चाहता हूं कि क्यों? अन्तस् से आवाज आती है.....'समझ' और पुनः मैं एक निष्कर्ष पर आता हूँ  आदमी कम समझदार..... और वैज्ञानिक उन्नति मुझे दो थप्पड़ मार के सुला देती है।

भय!

बहक जाते है अक्सर लोग जब वो किसी से अत्यधिक स्नेह करते है स्नेह आत्मा को जगाने का काम करता है लेकिन समाज सदियों से स्नेह के विपरीत रहता है और इस तरह से समाज स्नेह को,विशुद्ध स्नेह को कुचल देता है, बड़ी बेरहमी से कुचल देता है। स्नेह बिल्कुल सरल होता है,स्नेह एक सहज भाव है जो स्वस्थ्य चित्त में उपजता है.....बिल्कुल सौम्य है स्नेह का रूप। आज के दौर में स्नेह दिखता ही नही और यदि दिखता है तो बहुत कम है इसकी मात्रा। लोग यन्त्र हो गए हैं यंत्रवत व्यवहार करते चले जा रहे हैं। ये यंत्रवत्ता त्यागे बगैर कैसे हो प्रेम से परिचय। मुझे बहुत कम लोग मिलते है जो प्रसन्न हो सबके सब शिकायतों से भरे हैं,मैं भी भर गया हूँ शिकायतों से इन लोगों से मिलकर। मैं कभी-कभी रुकता हूँ किसी भीड़ से भरी सड़क के किनारे, खड़ा हो जाता हूँ और गौर से देखता हूँ लोगों को,लोग मुझे नदी के बहाव में बहते दिखते हैं तड़पते दिखते हैं..... सब एक आपाधापी में लगे हैं भयंकर आपाधापी। मेरे मन मे ख्याल आता है कि किसी को रोकू सहज होकर उसके हृदय की हाल सुनु,अपनी कहूँ मैं कह-सुन भी पाता हूँ ये सब जो गरीब होते हैं,अमीरों क...

भँवर!

दर्द लिख दूं मैं एहसास लिख दूं मैं मगर कैसे लिखू वो ख़्वाब जो टूटा हुआ-सा है... कहा था कि नही कुछ होगा मुझे तेरे जाने के बाद बहुत कुछ टूट कर देखो यहाँ, बिखरा हुआ-सा है... ये कैसे चल रही सांसे ये कैसे बह रही आहें तुम ही तुम हो यहाँ देखो तरसती जा रही आँखे... ये शब्द भी अवसाद हैं जीवन-डगर की प्यास है कि तुम नही मिली मुझे गिला नही कोई मुझे... मगर कोई है मुझमे जो मेरे बाद भी रोता है मैं लाख सुलाता हुँ वो हरगिज नही सोता है.... कभी-कभी जी मे आता है वीरान जंगल सा जलता जाता है मेरे अंदर एक दावानल ये कब बुझेगा..... सांस और तुम हमेशा साथ आती हो, दिखाई दो या न दो हमेशा पास रहती हो... कि मैं बावरा हुआ-सा भागता जा रहा हूँ मगर तुम और तुम्हारी यादे मुझे भागने नही देती.... ये आंखे अब कभी यूँ ही मैं मूँद नही पाता इन काँपते हाथों से ज्यादा लिख नही पाता.... ये ज़िन्दगी मेरी अब दोस्त बस मेरी नही रही तुम्हारे बाद इसमें अब हज़ारों लोग बसते हैं.... और मैं अपाहिज होकर देखता ही रहता हूँ बस देखता-देखता-देखता सा गुजर जाऊँगा मैं इस भँवर से।।

प्यार की गृहस्थी!

प्यार गृहस्थ का घर होता है वो बड़े संघर्ष के बाद निर्मित होता है प्यार के निर्माण में प्रेमी सब कुछ दांव लगाता है। ये सब कुछ आसान नही होता प्रेमी की पहचान मिट जाती है जमाने की गालियों से मुकाबला करता है वो बड़ी श्रद्धा से विश्वास से युक्त प्रेमी स्वयं में परमात्मा को अधिस्थित करता है.. स्वाभाविक प्रक्रिया है प्रेम बाकी सब,प्रेम के अतिरिक्त जैसे घृणा, द्वेष डाह इत्यादि विशिष्ट है क्योंकि इसे मनुष्यों ने बनाया है! इन्ही की विशिष्टता के कारण दुनिया जटिल है अत्यधिक जटिल..... इस प्यार की गृहस्थी का सबसे बड़ा सत्रु है अविश्वास,शंका एवं सन्देह!