रिश्तों की समझ!
सचमुच हर रिश्ते की एक
उम्र होती है...
वैसे ये भ्रम रहता है रिश्तों को
अबाध और अनन्त होने का
किन्तु......ये मात्र भ्रम है...
जब दो मिलते हैं
तब रिश्ते बनते है
एक नाम मिल जाता है
प्रत्येक रिश्ते को.....
फिर इसे सच्चे और झूठे
के तराजू पर तौला जाता है....
परन्तु सच्चे रिश्ते तो आसमान में बनते हैं
और आसमानी रिश्ते हमे आमतौर पर नही दिखते हैं।
इसका मूल वजह जानना चाहता हूं कि क्यों?
अन्तस् से आवाज आती है.....'समझ'
और पुनः मैं एक निष्कर्ष पर आता हूँ
आदमी कम समझदार.....
और वैज्ञानिक उन्नति
मुझे दो थप्पड़ मार के सुला देती है।
उम्र होती है...
वैसे ये भ्रम रहता है रिश्तों को
अबाध और अनन्त होने का
किन्तु......ये मात्र भ्रम है...
जब दो मिलते हैं
तब रिश्ते बनते है
एक नाम मिल जाता है
प्रत्येक रिश्ते को.....
फिर इसे सच्चे और झूठे
के तराजू पर तौला जाता है....
परन्तु सच्चे रिश्ते तो आसमान में बनते हैं
और आसमानी रिश्ते हमे आमतौर पर नही दिखते हैं।
इसका मूल वजह जानना चाहता हूं कि क्यों?
अन्तस् से आवाज आती है.....'समझ'
और पुनः मैं एक निष्कर्ष पर आता हूँ
आदमी कम समझदार.....
और वैज्ञानिक उन्नति
मुझे दो थप्पड़ मार के सुला देती है।
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