भय!

बहक जाते है अक्सर लोग
जब वो किसी से अत्यधिक स्नेह करते है
स्नेह आत्मा को जगाने का काम करता है
लेकिन समाज सदियों से स्नेह के विपरीत रहता है
और इस तरह से समाज स्नेह को,विशुद्ध स्नेह को
कुचल देता है, बड़ी बेरहमी से कुचल देता है।

स्नेह बिल्कुल सरल होता है,स्नेह एक सहज भाव है
जो स्वस्थ्य चित्त में उपजता है.....बिल्कुल सौम्य है स्नेह का रूप।

आज के दौर में स्नेह दिखता ही नही और यदि दिखता है तो
बहुत कम है इसकी मात्रा।
लोग यन्त्र हो गए हैं यंत्रवत व्यवहार करते चले जा रहे हैं।
ये यंत्रवत्ता त्यागे बगैर कैसे हो प्रेम से परिचय।

मुझे बहुत कम लोग मिलते है जो प्रसन्न हो
सबके सब शिकायतों से भरे हैं,मैं भी भर गया हूँ
शिकायतों से इन लोगों से मिलकर।
मैं कभी-कभी रुकता हूँ किसी भीड़ से भरी सड़क
के किनारे, खड़ा हो जाता हूँ और गौर से देखता हूँ
लोगों को,लोग मुझे नदी के बहाव में बहते दिखते हैं
तड़पते दिखते हैं.....
सब एक आपाधापी में लगे हैं भयंकर आपाधापी।
मेरे मन मे ख्याल आता है कि किसी को रोकू
सहज होकर उसके हृदय की हाल सुनु,अपनी कहूँ
मैं कह-सुन भी पाता हूँ ये सब जो गरीब होते हैं,अमीरों
के तेवर से तो मुझे भी भय लगता है कि कहीं दो चार चमाट
लगा न दे मुझे ही.....लेकिन ये भय भयंकर रूप से व्याप्त है।

मैं सड़क के किनारे से वापस अपने घर चला आता हूँ।
यही भय बुद्ध का दुख है यही दुख बुद्ध को मजबूर कर देता है
सबकुछ त्यागने को।









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