प्यार की गृहस्थी!

प्यार गृहस्थ का घर होता है
वो बड़े संघर्ष के बाद निर्मित होता है
प्यार के निर्माण में प्रेमी सब कुछ दांव लगाता है।

ये सब कुछ आसान नही होता
प्रेमी की पहचान मिट जाती है
जमाने की गालियों से मुकाबला करता है वो
बड़ी श्रद्धा से विश्वास से युक्त प्रेमी
स्वयं में परमात्मा को अधिस्थित करता है..

स्वाभाविक प्रक्रिया है प्रेम
बाकी सब,प्रेम के अतिरिक्त जैसे
घृणा, द्वेष डाह इत्यादि विशिष्ट है
क्योंकि इसे मनुष्यों ने बनाया है!
इन्ही की विशिष्टता के कारण दुनिया जटिल है
अत्यधिक जटिल.....

इस प्यार की गृहस्थी का सबसे बड़ा
सत्रु है अविश्वास,शंका एवं सन्देह!



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