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Showing posts from June, 2018

मैं ही मुझसे...यूँही!

रहना है तुमको इसी जगत में रहना है यूँही रोकर-हंसकर तुम हो अनूठे विरले हो... पीड़ित हो रोगों से तुम... अपनों से और परायों से। किन्तु तुम्हे ये याद रहे... जो पीड़ित है वो तुम नही हो वो मन है और मन का मनुष्य है! और तुम मनुष्यता से भी परे एक अनन्त चैतन्य हो... अतः पीड़ित न रहो, जो भी पीड़ा है ये पुष्प बनेंगे और ये पुष्प भी मात्र दो दिन बाद झड़ जाएंगे.... और झड़ने के बाद फिर पीड़क और पीड़ित की ये सृंखला पुनः प्रारम्भ हो जाएगी.... इसलिये अनुग्रह का भाव मत त्यागना चाहे कोई भी विपदा हो आपदा हो अपने रोम-रोम को अनुग्रह से भर देना बल्कि उनको ज्यादा जो तुम्हारे पीड़क हैं इसलिए कि वो तुम्हे तुम्हारी चेतना से मिलाते हैं! जब तुम यूँही जीवन प्रवाह में बहोगे निर्विकल्प,निर्विवाद एवं अनासक्त! ये जीवन-चक्रण की सृंखला टूट जाएगी और तुम अंतरिक्ष मे समाहित हो जाओगे! इसलिए तुम मेरी ये समस्त बाते याद रखना! तुम्हारा! सार्थक साथी! जो तुम्हारे साथ अनवरत काल से है!

आँसू

आँसू! जब समस्त व्यथा का निचोड़ आंसुओं से अभिव्यक्त हो जाये! कर्म-कल्मष सारे पाप धुल जाएं वो पल सुखमय हो जाये आँसू नयनों में आएं! अट्टहास से ज्यादा मुझको आँसू ही भाते हैं.... तुम करते हो मन को भाररहित पीड़ा बह जाती तुम संग! तुम अद्भुत सखा हमारे हो हे आँसू आते रहना मन को सहलाते रहना!

दिवानगी!

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प्रेम ही मेरा धर्म प्रेम ही मेरी जाति है प्रेम में मैं हमेशा अधिस्थित रहा, बचपन से माँ का प्रेम नही छूटा। माँ मेरे अंतरतम में जीवित है... जीवित रहेगी मेरी आखिरी सांस तक। माँ प्रकृति होती है पुत्र पुरूष होता है माँ से छूटना दुरूह है या ये कहिये बेहयाई! स्मृति भी प्रकृति का अंग है और हे प्रिय! तुम्हारी स्मृतियां जाती ही नही। तुम भी माँ हो और मैं तुम्हारा दुलारा पुत्र मैं अपने व्यवहार में अतिरेक कर सकता हूँ! तुम्हे रिझाने के लिये!कि तुम मेरे पास रहो माँ की तरह! पिता भी माँ में समाहित हैं,पिता जैसी जिम्मेदार बनके मुझे परिवार की "अनुभूति" कराओ! मेरे अंतस में अपार पीड़ा है अपनी एक झप्पी लगाकर मेरे प्राण को मुक्त कर दो! क्योंकि मुझे नही रहना अब इस धरा पर मैं बस तुम्हारे स्नेह के इंतज़ार में रुका हूँ सांसो को बेबस होकर देख रहा हूँ स्वांसों से सटी आत्मा की तृष्णा हो तुम और जो मुक्त कर दे प्राण को वो "निर्वाण" भी हो तुम! तुम्हारे पाँव आएँगे मेरे पास मेरी कोई दहलीज़ नही! तुम्हारी इच्छा बस तुम्हे मेरे तक मेरे प्राण तक, पहुंचा देगी! इंतजार में ही ...

आपकी एक मुस्कान!

बातो-बातो के दौरान मुझे एक दिव्यानुभूति हुई सामने आपके बैठा हुआ मैं और आपकी एक सहज मुस्कान! योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा दिया गया एक अतिश्रेष्ठ उपहार.... आपकी वो सहज मुस्कान। तपस्या का फल मिलता है मैंने तपश्चर्या में तमाम उम्र गुजारी उसका प्रतिफल आपकी अद्भुत सौम्य मुस्कान! वो मुस्कान मेरे ज़हन में ज़िंदा रहेगी, फलेगी फूलेगी मेरे मरने के बाद भी मेरे प्राणों की अनुभूति संग अखण्ड रहेगी। आपका आश्चर्य भरा प्रश्न आपका दरवाजे पर ख़ड़े-खड़े मुझको अंदर ले जाकर बिठाना.... इतनी गहन अनुभूति कि मुझे अब कोई ख्वाहिश नही रही अब आप अंतर्निहित हैं मुझमे... बस अपनी मुस्कान को गले लगाकर कठिन-से कठिन लक्ष्यों में लगे रहिये क्यूंकि मुझे देखना है वो दिन जब आप अपने जीवन के समस्त लक्ष्यों को बहादुरी से प्राप्त करे! और अपनी जीवन यात्रा की सार्थकता को हासिल करें! आपका अहिंष्य!

अकेलापन एक घाव!

जब मैं अकेला होता हूँ, जब कोई नही होता है मेरे एहसास में.... एक समुंदर में उतरता हूँ मैं जिसका पानी खारा नहीं मीठा होता है...... ये मीठा जल मेरे समस्त कड़वे तमस को समाहित कर ले जाता है स्वयं में.... और उस वक़्त मुझे सबको त्याग कर.. अकेले और अकेले बस अकेले चलने का जी होता है! सारे रिश्ते मुझे स्वांग लगते है उस वक़्त...जितना करीब रिश्ता उतने ही जटिल घाव.... ये घाव ऐसे हैं जो मरहम से नही वक़्त के साथ ठीक होते हैं... घाव का डर नही मुझे घावों से भरा इतिहास है मेरा और घावों से भरा भविष्य भी होगा... अकेलापन भी एक घाव ही है एक विशिष्ट घाव... काश! ज़िन्दगी भी माँ की तरह होती सन्तोषी माँ की तरह...जिसने आजतक मुझसे कोई शिकायत नही की! किन्तु ये असम्भव है ज़िन्दगी माँ नही अपितु पिता की फटकार है फ़टकार... ज़िन्दगी का भी कोई चरित्र नही ज़िन्दगी चरित्रहीन है....एक तवायफ़ है... जो बदलती रहती है बहती रहती है कभी इस ओर कभी उस ओर... ज़िन्दगी को फ़र्क़ नही पड़ता अकेलेपन से दर्द से,उलाहनों से! ज़िन्दगी तो बस पीसती रहती है नए-नए रंग से नए-नए ढंग से... इस पीसती-पिसाती हुई ज़िन्दग...

कब्ज़!

क्या ये जो मैं लिखता हूँ ये यूँही है? या इसका कोई उद्देश्य है!ये प्रश्न मुझे परेशान करते हैं कभी कभी!तब मैं आसान-सा जवाब दे देता हूँ इन प्रश्नों को ज़िन्दगी का हवाला देते हुए। ज़िन्दगी भी तो हम बेवजह ही जीते हैं,है कोई जानता कि जिंदगी का एक-एक पल जो व्यतीत हो रहा है इसका उद्देश्य है या उद्देष्यविहीन है। फिर मैं जवाब भी यथेष्ट देता हूँ इन प्रश्नों का;कि मैं उल्टी करता हूँ अपने विचारों का जिससे मुझे कब्ज़ न हो! क्योंकि कब्ज़ मेरे मुल्क में ८०% लोगों को है। मैं अपनी कब्ज को ठीक कर लेता हूँ लोगों की फ़िक्र करने वाला मैं होता ही कौन हूँ! मुझे तो मेरे मैं को भी विसर्जित करना है और कर रहा हूँ नारायण के संरक्षण में। एक बात जो ध्रुव-सत्य है कि व्यक्ति का मित्र भी एवं शत्रु भी वो स्वयं ही होता है।चुनाव निर्धारित करता है आगामी जीवन। हम सुधरंगे नही किन्तु अभिलाषा है सम्पूर्ण जगत सुधार ले।         बात जब देश की आती है तो मुझे तंत्र और तंत्र-संचालन देख कर घृणा होती है। चार वर्ग राष्ट्र में अगर ढंग से कार्य करे तो लगभग ९०%  समस्या वैसे ही सुधर जाएगी पुलिस, एडवोकेट, शिक्ष...

उत्सुकता!

जीवन एक प्रवाह हुआ है यही सत्य है बाकी मिथ्या! स्वप्न ही यथार्थ हुआ है... तुम हो भी या हो तुम मिथ्या! तुमसे कब मैं मिल पाऊंगा मन मे मची है एक खलबली! क्यों आखिर ये है बेचैनी क्यों आखिर हर घुट स्वांस की नाम तुम्हारा लिये हुए है! क्या "रहस्य" है जीवन का तुमसे है सम्बन्ध मेरा क्या? आती-जाती स्वांसों से बस.. अब यही प्रश्न है शेष रहा...। तुम प्रतिपल हो, तुम जीवन हो तुम्ही प्रेयसी तुम दिव्यानी! मेरा, तुमसे जीवन विलग नही है तुम ही हो बस तुम ही तुम हो... मैं हूँ कहाँ?यही उत्सुकता बस मन मे है! मैंने जीना छोड़ दिया है डर के नही, मिल के तुमसे तुम जीवन-सरिता में प्रिय पतवार हो-रखवार हो।। वक़्त मिले गर तुमको प्रिय, एक बार बस मिलने आ जाना... क्या-क्या सोचा-जिया तुमने, एक बार आकर बता जाना! मेरे जाने के पहले तुम... बस यही "रहस्य" सुलझा जाना।। रोएं-रोएं की अनुभूति को मुझको तुम समझा जाना!

प्रेम एक महादान!

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प्रेम प्रस्फुटित होता है हजारों विपदाओं को सहर्ष स्वीकारने के बाद। प्रेम प्रस्फुटित होता है जब पाने की कोई अभिलाषा शेष न हो।मसलन त्याग और प्रेम एक दूसरे के पर्याय हैं या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।यूँ तो प्रेम ढाई अक्षर का शब्द हैं मात्र किन्तु वृहद पैमाने पर इसकी धारिता असीम होती है।प्रेम परमात्मा को प्राप्त करने हेतु एक सोपान है और आवश्यक सोपान है;बिना प्रेम के परमात्मा की कल्पना भी नही की जा सकती।     ये आवश्यक नही है कि प्रेम प्रेयसी से या प्रेमी से ही हो बल्कि प्रेम तो एक अवस्था है हमारी चेतना का,जब हम प्रेम में होते है तो लुटाते हैं, जो कुछ भी हो हमारे पास और जब हम बुद्धियुक्त होते है तो पाने के फिराक में रहते हैं।    इसलिए प्रेम एक महादान है जो हम किसी को देते हैं और एक बात प्रेम की गणित बिल्कुल उल्टी है जो बाटने से बढ़ती है..     हमें सिखाना होगा प्रेम अपनी पीढ़ी को,आगन्तुक पीढ़ी को क्योंकि प्रेम ही वो विकल्प है जिससे संघर्ष विसर्जित होता है। दुनिया के समस्त संघर्षों के अस्तित्व के मूल में प्रेम का अभाव है।दुनिया के समस्त संघर्ष मात्र वर्चस्व के ...

आँखे!

नयन आपके थे, अनवरत साधिका के.. नयन मेरे भी थे... हमेशा से झुके-झुके! प्यास थी मुझमे जन्म-जन्मों की आपमे स्थिरता है युगों-युगों से देखने के बाद आपको पहली मर्तबा.. नयन हैं पुंसवित करते नित-नित कुछ... समय के साथ-साथ प्रिय झुकी नजरों का आदी 'मैं' विसर्जन में लगाया खुद को वासना के निर्मूलन में.... हुए परिवर्तन नित-नूतन रही नही कोई "आकांक्षा" अब किन्तु-किन्तु-किन्तु..... अब मैं आपके साथ हूँ अनन्त काल तक अखण्ड... बस तबसे, जबसे नयन मेरे मिले नयन से किसके? आपके नयन से! दो नयन मिले बस की मेरी सांसारिक मृत्यु हो गयीं... अब मेरी आत्मा आपकी आत्मा में स्थापित है..... प्रभाकर अब निशा की अखंडता में अहर्निश निद्रा में सो रहा है.... निर्द्वन्द्व, निर्विकार, निर्विकल्प!

खत..९

दिन भर चलता रहता हूँ एक क्षण नही रुकता हूँ ना काहू से दोस्ती! ना काहू से बैर.... क्यों क्योंकि मैंने अनुभूत किया है आपको रोम-रोम से आत्मा तक! आपको पाने की अभिलाषा भी नही न ही खोने का डर... आपकी छवि,मुस्कान,माधुर्य ये औषधि हैं मेरे लिये आपकी एक तसवीर भी नही मेरे पास किन्तु आप सजीव विचरण करती हैं..मुझमे.. क्या होगा ये अज्ञात है किन्तु मेरे वर्तमान में आप हैं और अनवरत रहेंगी,, आपकी यादों के साथ ही मेरी आँख आखिरी बार मुंदी जाएंगी...... आपका और सिर्फ आपका! अहिंष्य!

खत-८

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मैं प्रेमी हो ही नही सकता! मैं गुरु होकर ही जन्मा हूँ मैंने आपसे प्रेम कभी किया ही नही छल किया,प्रति पल छल... लेकिन गुरुत्व के रूप में मैं शतप्रतिशत समर्पित था,हूँ और रहूँगा। विरह,मिलन इत्यादि मेरे लिये शब्द मात्र हैं मेरे पास हृदय नही प्रेम वाला! किन्तु हाँ; मेरा छल आपके विशिष्टीकरण हेतु रहा... सब कुछ मेरे बस में था किंतु मैंने बेबसी का स्वांग रचा इसलिए कि आप इतिहास रच सके.... मेरा क्या है,मेरी फिक्र मत करियेगा.. क्योंकि इस संसार मे कोई भी मेरे साथ चलने कि हिम्मत लेकर नही पैदा हुआ न होगा तो आप क्या चीज हैं! ईश्वर आपको स्वस्थ रखेंगे इस वर्ष आपको इतिहास रचना है अपने काबिलियत से... मैं एक पथभ्रष्ट गुरु हूँ इसलिए निश्चिंत रहिये आप को या आपके साये से भी गुरुदक्षिणा नही मांगूंगा! आपका सखा(एक कपटी! Flrtatious)