उत्सुकता!

जीवन एक प्रवाह हुआ है
यही सत्य है बाकी मिथ्या!
स्वप्न ही यथार्थ हुआ है...
तुम हो भी या हो तुम मिथ्या!

तुमसे कब मैं मिल पाऊंगा
मन मे मची है एक खलबली!
क्यों आखिर ये है बेचैनी
क्यों आखिर हर घुट स्वांस की
नाम तुम्हारा लिये हुए है!

क्या "रहस्य" है जीवन का
तुमसे है सम्बन्ध मेरा क्या?
आती-जाती स्वांसों से बस..
अब यही प्रश्न है शेष रहा...।

तुम प्रतिपल हो,
तुम जीवन हो
तुम्ही प्रेयसी तुम दिव्यानी!

मेरा,
तुमसे जीवन विलग नही है
तुम ही हो बस तुम ही तुम हो...
मैं हूँ कहाँ?यही उत्सुकता बस मन मे है!

मैंने जीना छोड़ दिया है
डर के नही, मिल के तुमसे
तुम जीवन-सरिता में प्रिय
पतवार हो-रखवार हो।।

वक़्त मिले गर तुमको प्रिय,
एक बार बस मिलने आ जाना...
क्या-क्या सोचा-जिया तुमने,
एक बार आकर बता जाना!

मेरे जाने के पहले तुम...
बस यही "रहस्य" सुलझा जाना।।
रोएं-रोएं की अनुभूति को
मुझको तुम समझा जाना!



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