प्रेम एक महादान!

प्रेम प्रस्फुटित होता है हजारों विपदाओं को सहर्ष स्वीकारने के बाद। प्रेम प्रस्फुटित होता है जब पाने की कोई अभिलाषा शेष न हो।मसलन त्याग और प्रेम एक दूसरे के पर्याय हैं या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।यूँ तो प्रेम ढाई अक्षर का शब्द हैं मात्र किन्तु वृहद पैमाने पर इसकी धारिता असीम होती है।प्रेम परमात्मा को प्राप्त करने हेतु एक सोपान है और आवश्यक सोपान है;बिना प्रेम के परमात्मा की कल्पना भी नही की जा सकती।
    ये आवश्यक नही है कि प्रेम प्रेयसी से या प्रेमी से ही हो बल्कि प्रेम तो एक अवस्था है हमारी चेतना का,जब हम प्रेम में होते है तो लुटाते हैं, जो कुछ भी हो हमारे पास और जब हम बुद्धियुक्त होते है तो पाने के फिराक में रहते हैं।
   इसलिए प्रेम एक महादान है जो हम किसी को देते हैं और एक बात प्रेम की गणित बिल्कुल उल्टी है जो बाटने से बढ़ती है..
    हमें सिखाना होगा प्रेम अपनी पीढ़ी को,आगन्तुक पीढ़ी को
क्योंकि प्रेम ही वो विकल्प है जिससे संघर्ष विसर्जित होता है।
दुनिया के समस्त संघर्षों के अस्तित्व के मूल में प्रेम का अभाव है।दुनिया के समस्त संघर्ष मात्र वर्चस्व के लिये है और प्रेम तो समता लाता है।
    प्रेम ही वो विधि है जिससे दुनिया खूबसूरत होती है,प्रेम ही सृष्टि के अनवरत जीवन्त रहने का कारण है।
   इसलिए दुनियावालों तुम प्रेम चुनों एक भी अवसर प्रेम का जाने मत दो,प्रेम में डूब कर नृत्य करो,प्रेम के महादान रूपी उत्सव के भागीदार बनो।

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