मैं ही मुझसे...यूँही!

रहना है तुमको इसी जगत में
रहना है यूँही रोकर-हंसकर
तुम हो अनूठे विरले हो...
पीड़ित हो रोगों से तुम...
अपनों से और परायों से।

किन्तु तुम्हे ये याद रहे...
जो पीड़ित है वो तुम नही हो
वो मन है और मन का मनुष्य है!

और तुम मनुष्यता से भी परे
एक अनन्त चैतन्य हो...
अतः पीड़ित न रहो,
जो भी पीड़ा है ये पुष्प बनेंगे
और ये पुष्प भी मात्र दो दिन बाद
झड़ जाएंगे....
और झड़ने के बाद फिर
पीड़क और पीड़ित की ये सृंखला
पुनः प्रारम्भ हो जाएगी....


इसलिये अनुग्रह का भाव मत त्यागना
चाहे कोई भी विपदा हो आपदा हो
अपने रोम-रोम को अनुग्रह से भर देना
बल्कि उनको ज्यादा जो तुम्हारे पीड़क हैं
इसलिए कि वो तुम्हे तुम्हारी चेतना से मिलाते हैं!

जब तुम यूँही जीवन प्रवाह में बहोगे
निर्विकल्प,निर्विवाद एवं अनासक्त!
ये जीवन-चक्रण की सृंखला टूट जाएगी
और तुम अंतरिक्ष मे समाहित हो जाओगे!

इसलिए तुम मेरी ये समस्त बाते याद रखना!

तुम्हारा!
सार्थक साथी!
जो तुम्हारे साथ अनवरत काल से है!

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और कई बार जब ये सूख जाते है तो मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है।

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