दिवानगी!

प्रेम ही मेरा धर्म प्रेम ही मेरी जाति है
प्रेम में मैं हमेशा अधिस्थित रहा,
बचपन से माँ का प्रेम नही छूटा।

माँ मेरे अंतरतम में जीवित है...
जीवित रहेगी मेरी आखिरी सांस तक।

माँ प्रकृति होती है पुत्र पुरूष होता है
माँ से छूटना दुरूह है या ये कहिये बेहयाई!

स्मृति भी प्रकृति का अंग है
और हे प्रिय! तुम्हारी स्मृतियां जाती ही नही।

तुम भी माँ हो और मैं तुम्हारा दुलारा पुत्र
मैं अपने व्यवहार में अतिरेक कर सकता हूँ!
तुम्हे रिझाने के लिये!कि तुम मेरे पास रहो माँ की तरह!
पिता भी माँ में समाहित हैं,पिता जैसी जिम्मेदार बनके
मुझे परिवार की "अनुभूति" कराओ!

मेरे अंतस में अपार पीड़ा है
अपनी एक झप्पी लगाकर मेरे
प्राण को मुक्त कर दो!

क्योंकि मुझे नही रहना अब इस धरा पर
मैं बस तुम्हारे स्नेह के इंतज़ार में रुका हूँ
सांसो को बेबस होकर देख रहा हूँ
स्वांसों से सटी आत्मा की तृष्णा हो तुम
और जो मुक्त कर दे प्राण को वो "निर्वाण" भी हो तुम!

तुम्हारे पाँव आएँगे मेरे पास
मेरी कोई दहलीज़ नही!
तुम्हारी इच्छा बस तुम्हे मेरे तक
मेरे प्राण तक, पहुंचा देगी!

इंतजार में ही हूँ और रहूँगा भी
कि तुम आओ और मैं तुम्हारी छांव के साथ
जा सकूं वहाँ जहाँ से कोई कभी वापस नही आता!



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