खत..९
दिन भर चलता रहता हूँ
एक क्षण नही रुकता हूँ
ना काहू से दोस्ती!
ना काहू से बैर....
क्यों क्योंकि मैंने अनुभूत किया है
आपको रोम-रोम से आत्मा तक!
आपको पाने की अभिलाषा भी नही
न ही खोने का डर...
आपकी छवि,मुस्कान,माधुर्य
ये औषधि हैं मेरे लिये
आपकी एक तसवीर भी नही मेरे पास
किन्तु आप सजीव विचरण करती हैं..मुझमे..
क्या होगा ये अज्ञात है
किन्तु मेरे वर्तमान में आप हैं और अनवरत रहेंगी,,
आपकी यादों के साथ ही मेरी आँख आखिरी बार मुंदी जाएंगी......
आपका और सिर्फ आपका!
अहिंष्य!
एक क्षण नही रुकता हूँ
ना काहू से दोस्ती!
ना काहू से बैर....
क्यों क्योंकि मैंने अनुभूत किया है
आपको रोम-रोम से आत्मा तक!
आपको पाने की अभिलाषा भी नही
न ही खोने का डर...
आपकी छवि,मुस्कान,माधुर्य
ये औषधि हैं मेरे लिये
आपकी एक तसवीर भी नही मेरे पास
किन्तु आप सजीव विचरण करती हैं..मुझमे..
क्या होगा ये अज्ञात है
किन्तु मेरे वर्तमान में आप हैं और अनवरत रहेंगी,,
आपकी यादों के साथ ही मेरी आँख आखिरी बार मुंदी जाएंगी......
आपका और सिर्फ आपका!
अहिंष्य!
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