आँखे!

नयन आपके थे,
अनवरत साधिका के..
नयन मेरे भी थे...
हमेशा से झुके-झुके!

प्यास थी मुझमे जन्म-जन्मों की
आपमे स्थिरता है युगों-युगों से
देखने के बाद आपको पहली मर्तबा..
नयन हैं पुंसवित करते नित-नित कुछ...

समय के साथ-साथ प्रिय
झुकी नजरों का आदी 'मैं'
विसर्जन में लगाया खुद को
वासना के निर्मूलन में....

हुए परिवर्तन नित-नूतन
रही नही कोई "आकांक्षा" अब

किन्तु-किन्तु-किन्तु.....

अब मैं आपके साथ हूँ
अनन्त काल तक अखण्ड...

बस तबसे,
जबसे नयन मेरे मिले नयन से
किसके? आपके नयन से!
दो नयन मिले बस की मेरी
सांसारिक मृत्यु हो गयीं...
अब मेरी आत्मा आपकी आत्मा
में स्थापित है.....
प्रभाकर अब निशा की अखंडता
में अहर्निश निद्रा में सो रहा है....
निर्द्वन्द्व, निर्विकार, निर्विकल्प!






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