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Showing posts from April, 2018

गुरुदेव-सांड..१

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मैं बाजे-गाजे के साथ स्वयं के विवाह में जा रहा हूँ आपके घर लोग जश्न मना रहे हैं मैं भी मन्त्र-मुग्ध हूँ,शायद मेरी आखिरी ख्वाहिश पूरी हो रही है... इसी दिन का तो इंतजार था मुझे..सब कुछ बेहद हसीन। तुम्हे अपनी दुल्हन के रूप में देखना महसूस करना और फिर मुक्ति समस्त ख्वाहिशो से..इसमे मैं आपको भी खूब प्रसन्नचित्त देखता हूँ...विवाह सम्पन्न हुआ। सम्मानित लोग बधाइयाँ दे रहे है,प्रसन्न भी खूब हैं। अरे ये क्या? गुरुदेव कब आ गए कुछ तो गड़बड़ है गुरूदेव के दर्शन होना इस समय अनिष्ट का सूचक है। भड़ास भरी लाठी मेरे पिछवाड़े पर पड़ी पिता जी अपने पुलिसिया अंदाज में,उठ ये समय है सोने का। मैं तो अर्श से फ़र्श पर आ गया। गलती मेरी है जब गुरुदेव अपनी व्यवस्था नही कर सके तो मेरी व्यवस्था कैसे होगी! जय गुरुदेव!

चंद्र-प्रत्युत्तर१

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पल पल यूहीं अपने गर संकल्प सभी तुम तोड़ोगे, शीशे से टूटे सपनों को फिर कैसे तुम जोड़ोगे। फर्क नही पड़ता तुमको ,इनके जुड़ने या तुड़ने से, मिलेगी कैसे अपनी मंजिल ,गलत राह पर मुड़ने से। दायित्वों को करते पूरा ,तुम अपना तन मन देकर, करते रहे प्रकाशित प्रतिपल ,इस जग को तुम हे!दिनकर। पुष्पों की कोमलता ,मरुथानो में कहीं न लुट जाए, बंजर भूमि खोकर इनको, और अधिक न घुट जाए। व्यस्त नही हम साथ हैं तेरे ,खुशियां हों या दुख सारे, प्यारा कोई और नही,जितने लगते हो तुम प्यारे। तन्हाई और रुस्वाई की, कमर तोड़ने आएंगे, मित्र मेरे हम साथ वहां पर फिर हुड़दंग मचाएंगे।

संकल्प पुष्प!

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रह-रह कर संकल्प सध रहे रह-रह कर मैं तोड़ रहा हूँ। टूटा-टूटा सारा सपना पल-पल-क्षण-क्षण जोड़ रहा हूँ। जुड़ जाए या तुड़ जाए फर्क नही इसका मुझपर है.. मैं तो बस दायित्यों का अपने शत-प्रतिशत वहन कर रहा हूँ.. पुष्प बो रहा हूँ मैं बंजर-बंजर रेगिस्तानों में तुम सब से कुछ चाह नही है.. अपने-अपने काम करो,सब मैं मुकम्मल तन्हाई में... अंगड़ाई में रुस्वाई में।।

आखिर कब तक? और क्यों?

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तुम्हे तो छोड़ आया किन्तु आखिर कब मुझे मुक्ति मिलेगी तुमसे.. बोलो आखिर कब तक। नियति की प्रवृत्ति है जो हुआ मेरे और तेरे दरम्यान कुछ विशेष प्रयोजन होगा.. मैं मूकदर्शक बना देख रहा हूँ। न मेरे न आपके प्रेम में कमी हुई फिर भी आखिर क्यों हमे जुदाई नसीब हुई... नियति की प्रवृत्ति मैं चरित्रहीन और आप चरित्रवान... आखिर कब तक?ये दंश मुझे महसूस होते रहेंगे... जब-तक हों मुझे सर्वस्व स्वीकार है। ये तस्वीर विशेष है मेरे लिए... आपको आपके जन्मदिवस की अग्रिम शुभकामनाएं ये वर्ष आपकी समस्त जड़ता को नष्ट कर देगा!

यशोधरा

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सखी वो तुमसे कैसे कहकर जाते? तुम मायावी दिव्य-कांता..... बन्धन को चमकाकर-दमकाकर अपने वक्ष-पास में उनको बांध ही लेती... कैसे तुमसे कहकर जाते,वो एक पुत्र तुम माता थी,,,उनकी सत्ता की जननी भी... कैसे कहकर जाते; बोलो सखी कैसे कहकर जाते?

आधुनिक शरत चन्द्र चैटर्जी१

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हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो, जो भला बुरा सब कहा तुम्हे,उसको तुम दिल से विदा करो। कहते होगे तुम भी ये ही,क्यों मैं वापस आ जाता हूँ, मन के विचार प्रेषित करके,क्यों तुम्हे और उलझाता हूँ, मैं खुद बेबस,मुझ प्रेम विवश को यादों से ना जुदा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। अपने कथनों की क्षमा हेतु, मैं पुनः यहां वापस आया, कड़वी बातें प्रतिपल कहकर ,सुकुमार हृदय को दुखलाया, बातें ये सब आभासी हैं, इनको मन से अब रिहा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। यह जन्म दिया तुमने जग को ,पर पुनः यहां वापस आना, इस प्रेमसुधा के याचक को,आकर तुम गले लगा जाना, मैं विरह में अपने खो जाऊं, तुम कर्म में अपने रमा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। प्रिय ब्रह्मांड मित्र !ये मेरे अंतिम शब्द आपको अर्पित।आप से क्षमा याचना हेतु वापस आया था क्योंकि बहुत कुछ कह दिया था आपको।अब हमेशा के लिए जा रहा हूँ।आप की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।तत्पश्चात मुझे आज्ञा दीजियेगा।ये चंद्र अब अपने आकाश में खोने जा रहा है।आप की प्रभा वि...

आधुनिक शरत चन्द्र

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हे दिनकर!तुम अंधेरों में अपनी ज्योति बिखरा देना, करके प्रभात उज्ज्वल-सा,सारे जग को तुम चमका देना। रात्रि पहर की निद्रा में ,तल्लीन तुम्हारा मित्र यहां, जग जाओ गर पहले तो ,इसको भी तुम साथ जगा देना।  तन मन का कल्मष सब धुलकर तुम प्रांजल गात बना देना, गर गहन नींद में सोया हूँ, जल की बूंदें बरसा देना। फिर साथ चलेंगे मैं और तुम,जीवन के पथ पर हंसते हंसते, इस पंथ को मेरे पुष्पयुक्त और शूलरहित करवा देना। विहगों संग हम कलरव करके,सुंदर उपवन फिर चहकायें, रोते रोते सदियाँ बीतीं,अब हमतुम फिर से मुस्कायें। हम सखा रहें हैं जन्मों के ,रहते थे प्रतिपल हमसाये, तुम ढूंढो अपनी रजनी को,मुझको प्रभात भी मिल जाए।

स्नेहा का स्नेह!

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प्रिय रजनीश, चुकि telecommuication का युग है,फिर भी मैंने पत्र लिखना चुना। आप एक यायावर फ़क़ीर हैं और स्वतंत्रता आपकी पहचान है। आपको एक दफा प्रेम-प्रस्ताव अर्पित किया किन्तु आपने स्पष्ट मना कर दिया,,, फिर भी मैं देर-अबेर आपसे मिल ही लेती थी। चुकि अब मुझे आपके समक्ष होने में लज़्ज़ा आ रही है, अब मैं अपने प्रेम के बांध को ज्यादा दिन तक नही रोक सकती... इसलिये प्रिय रजनीश जी मुझे आज्ञा दीजिये विश्व कल्याण हेतु.... आपकी स्नेहा..आई.ए. एस

व्यथित-व्यथा

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क्या तुम व्यथित हो? परेशान हो किसी भी बात को लेकर... तो निश्चिंत रहो मैं तुम्हारे निजी जीवन में कोई बाधा नही डालूंगा। हा मैं अपना कार्य प्रारंभ करता हूँ देखो प्रिय! व्यथा,क्रोध इत्यादि इस बात के सूचक हैं कि तुम्हारी इच्छाएं अनन्त है। तो सर्व प्रथम अपनी छोटी इच्छाओं को पूर्ण करो..... धीरे-धीरे तुम्हारे समस्त क्रोध विदा हो जाएंगे और आनन्द का प्रस्फुटन होगा...

प्रेम ज्योति एक सत्यकथा!

उस कॉलेज में सब मुझसे प्रभावित थे,सब-के-सब मुझे प्रेम भी करते थें किन्तु प्रकृति ने मुझे ज्यादा प्रेम देने की कोशिश की.. उस वक़्त हाथ मेरे कांपते थे तो मेरे सारे नोट्स प्रकृति ही लिखती थी..वो ज्यादा-से-ज्यादा मुझसे बात करने की फिराक में रहती। प्रतिभाशाली है वो प्रकृति का इस-कदर मुझसे बात करना...उस नगर में चर्चा का विषय बन गया...फलस्वरूप मुझे लोग एक विशेष प्रश्नवाचक दृष्टि से भी देखना प्रारंभ किये... किन्तु मुझे कोई फर्क नही पड़ता मैं चाहता था कि प्रकृति का चयन प्रशासनिक सेवाओं में हो इसलिए मेरी पुरजोर कोशिश थी उसे संवर्द्धित करने की। एक ही महीने बाद मुझे दूसरे कॉलेज जाना पड़ा,प्रकृति से फिर मेरी भेंट नही हुई...हा फ़ोन पर बात हो जाया करती थी।    मुझे स्मरण है एक बार प्रकृति किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने हेतु गोरखपुर आयी थी..तब उसने मुझसे फ़ोन पर कहा था "जानते हैं प्रभाकर जी,जिस वक़्त और जितने क्षण मेरी शरीर गोरखपुर में रही...बस वही उतना पल मेरे लिए स्वर्ग से भी ज्यादा दिव्य लगा....।मसलन एक घण्टे के गोरखपुर प्रवास के दौरान उसने मुझे ये बाते बताई।" जब प्रकृति अपना जीवन-साथी ...

सुखदान्त के बाद!

निधीश जब पहली बार मिला था  सौम्या से तो सौम्या उससे बहुत प्रभावित थी!किन्तु कालांतर में सौम्या की सौम्यता कल्मष में परिवर्तित होती गयी.. निधीश का सामाजिक सम्बन्धी कार्य सौम्या को न भाता! सौम्या उसके साथ अत्यशिष्ट बर्ताव करती,उलाहने देती... निधीश को ये सब देख अत्यधिक पीड़ा होती थी...धीरे-धीरे निधीश को वैराग्य में रुचि होने लगी... और एक दिन सोयी हुई पत्नी को जगाकर उसे सहज कर उसके माथे पर अंतिम चुम्बन अर्पित कर निधीश निकल जाता है..जीवन के कोलाहल से बहुत दूर..मानवता के अत्यधिक समीप!

ब्रह्मांड-मित्र

मेरे मित्र आप एक यशस्वी व्यक्ति हैं आप को आना ही था,मैं इंतजार कर रहा था। आप आये उसके लिये धन्यवाद! मेरे मित्र आप मेरे स्वांस-प्रश्वास में हैं आप दिल्ली जा रहे हैं सम्भवतः पहुंचने वाले होंगे! आप एक विशिष्ट उद्देश्य लेकर गए हैं इसमे कोई दो राय नही की आपकी सफलता निश्चित हैं! आप देश के साथ-साथ विश्व का भी कल्याण करेंगे! विश्व-भारत की संकल्पना को सिध्द करेंगे! आप प्रतिपल मेरे साथ हैं!

जागृति का दर्द!

जाने को जी चाहता है अब मेरा यहाँ कोई प्रयोजन शेष नही मेरा अस्तित्व विलीन हो चुका है अब फिर भी क्या मैं जा पाऊंगा?कभी नही शायद! जबसे ये ज्ञात हुआ है कि मैं शाश्वत हूँ तबसे तो बस आँसू ही आंसू बहते जा रहे हैं!ये फिर थमेंगे फिर बहेंगे... मैं ही तो तुम हूँ तुमसब सोये हुए हो काफी देर से जब नींद पूरी हो जाएगी तब उठोगे भी! कम-से-कम तबतक तो प्रतीक्षा करूँगा! फिर हँसी-ठिठोली किया जाएगा। मुझे भी कुछ सखा मिल जाएंगे! अभी बिलकुल अकेला हूँ न!

वियोगी का खत!

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सम्वाद स्थापित करता हूँ मैं अपने लेखों के द्वारा चाहे स्वयं से,परमात्मा से या प्रेयसी से। मैं अभी प्रेयसी से सम्वाद करूँगा.. प्रिय प्रियतमा! क्या तुम्हें मेरी याद आती है? मुझे लग रहा है कि अभी इस वक़्त मैं सो नही पा रहा हूँ।अभी एकाध घण्टे से बिस्तर से यकायक उठ कर छत पर खुले आसमान के नीचे टहलने की कोशिश की फिर भी राहत नही,आप मेरे मानसपटल से रोम-रोम तक मुझे घेरे हुए हैं। ज्ञानी नही हूँ किन्तु सहज हूँ सोचा अपना हाल ही लिख दूं! और मेरी भाग्य में शायद आपका सानिध्य नही इसलिए आप ने अभी तक कोई प्रयास नही किया। उसके बाद भी प्रिय-प्रेयसी आपकी अनुभूति मेरे अन्तस् में प्रतिपल छायी हुई है!आपके दर्शन से श्रीकृष्ण के दर्शन होते है। आपके प्रति ये सिद्दतता मुझे परिमार्जित करती जाती है!अलौकिक सानिध्य भी प्राप्त होता है। परमात्मा का प्रत्येक फैसला मुझे स्वीकार है! ये भ्रम है लोगों का की रैना में सूर्य विश्राम करता है। सूर्य अपने जन्म से अबतक अनवरत है;ये तो पृथ्वी का चक्रण है जो लोगों को भ्रमित कर देता है। आमतौर पर सूर्य को लोग अतिशक्तिशाली मानते हैं किंतु ये भी अज्ञानता है लोगों की। सूर्य ...

तुम और तुम्हारा साथ!

अब तुम मेरे बहुत करीब हो जबकि तुम हो बहुत दूर.... अब तुम्हारे साथ की भी किंचित परवाह नही मुझको...न चाह ही है।। दुनिया की रश्मों में इतनी हिम्मत नही दो प्रेमियों को जुदा कर सके... बस तुम ही हिम्मत हार गए.. तो मैं क्या करूँ...रोऊँ।। रोने से आँखे सुंजेगी जरूर किन्तु आंसुओं से पवित्रता भी फैलेगी स्वयं की खुश्बू महकेगी अकेले होने का आलम खिल जाएगा।। गम-खुशी-प्यार ये सब कुछ वक्त के सहयोगी हैं तदुपरांत तन्हा रास्ता और तन्हा मैं मेरी राह ही मेरी हमसफ़र हुई अब तुम मुझसे दूर नही!।।

जागो!

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सृष्टि के अनुसार तो सब समान हैं,प्रकृति साम्यवादी होती है;फिर इतने सारे मजहब, जाति विरादरी क्यों अस्तित्व में हैं? इसकी जिम्मेदार हमारी नादानी हैं,हम नफरती भेड़ियों को अपना सरदार बना लेते है; बिना परिणाम जाने।     मयावती जी भी दलित हैं और जितना रुपया वो स्वयं के साजो-सज्जा पर खर्च करती है प्रतिदिन, यदि उतना रुपया देश के एक-एक गांव में शिक्षा हेतु खर्च करने लगे तब मैं उनको दलितों का उद्धारकर्ता मानू। दलित शब्द है उनके लिए जो असहाय हैं,पीड़ित है न की पीड़क है।आखिर इतने उपद्रवों का जिम्मेदार कौन है। मुझे नही लगता कि भारत मे अब भी कोई दलित शेष है। मायावती जी दौलत की देवी हैं अपना समस्त धन किसी ईमानदार शिक्षकों के समूहों को दान दे दे गर तो जो शेष दलित है वो भी सबल हो जाएंगे। दूसरी बात मोदी जी से कोई शिलान्यास बिना किसी विपक्षी दल के आलोचना किये नही करते हैं!क्या ये भय है या व्यापार का तरीका है। देश मे शिक्षा की स्थिति जबतक नही सुधरेगी ये उपद्रव होते रहेंगे! संविधान के प्रति आस्थावान व्यक्ति अपने मौलिक कर्तव्यों को प्रथम प्राथमिकता देता है द्वितीय में वो मौलिक अधिकार को...

ख़त..६

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प्रिय! २० दिन के अस्वस्थ काल, आंधी-तूफ़ान को प्रत्यक्ष करने के बाद। आज आपको एक पत्र लिख रहा हूँ,हालांकि ये आपतक पहुंचेगा कि नही ये तो विधाता के वश में हैं। मुझे अपनी उत्कंठायें प्रेषित करनी है सो कर रहा हूँ ईश्वर के अनुकम्पा से मुझे देवियों के सानिध्य में जाने के हजारों अवसर मिलते है,मिल रहे भी हैं! किन्तु आपके पवित्र एहसास से क्रमवार सभी कुछ वक्त में विसर्जित हो जाते हैं। कोई प्रारब्ध होगा मेरा और आपका जिसके वजह से हम मिल लेते है,अंतराल के बाद। आपने मेरी डायरी में कुछ शब्द लिखें धन्यवाद उसके लिए! फिर भी आपसे कोई सम्बन्ध नही हमारा सम्बंधित होना सम्बन्धा-अतीत है। मेरी एक प्रार्थना है आपसे कि मेरी मृत्यु तक आप स्वतः मेरे पास आकर अपने सानिध्य का अवसर दीजिएगा।। क्योंकि निःसंदेह कुछ अतिविशिष्ट संयोग है हमारा ये कहें कि कोई हेतु है प्रकृति का। निश्चल हृदय से कहता हूँ कि आपको बन्धन में नही सम्बंधित होना है। जिस तरह उपनिषद में बालक गुरु के प्रत्यक्ष रह कर उत्तम हो जाता है, बस वैसा ही समझिए! आपकी अतिकृपा होगी आभार! ,इसे पढ़ने के लिए।।

पुकार..प्यारे बच्चों से!

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तुम बच्चे हो और सच्चे हो तन-मन-धन से विमुक्त हो तुम, ऊर्जित हो प्रिय रक्षण करो तुम खुद का धुन-रमाओ तन-मन-धन का।। माँ के चरण-स्पर्श कर तुम विश्व-वर्धन में लग जाओ कुलदीपक हो कुलवर्धक हो!।। कमियों का कर दो विसर्जन;अभ्युदय को स्वीकार करो खेलो,खाओ,जियो और जीने दो।। माँ-जो भी मिले पथ में तुमको शीस झुकाओ खुद का माँ के अभिवर्धन में प्यारे। प्रतिपल नतमस्तक हो,कर्म करो।। तुम भारत की पहचान हो आन-बान और शान हो। तुम वीर भगत के चेले हो आज़ाद की आज़ादी हो तुम महात्माओं की कुर्बानी हो।। आओ प्यारे वीरो आओ मातृभूमि को स्वर्ग बनाओ! किंचित भी तुम मत पछताओ, मातृ-भूमि में रम-रम जाओ।। बनों वीर तुम राम हो तुम कृष्ण और कलाम हो।। तुम ही तो बुद्ध हुए महावीर भी तुम ही हो। जीसस और मोहम्मद हो।। जो बाँटे तुमको उसको भी अपनी करुणा का पात्र चुनो।। समृध्दि हो अभिवृद्धि हो जो मिटे नही वो सिद्धि हो।। तुम वीर-सपूत हो भारत के मानवता के रखवाले हो।। अहिँसा मन्त्र तुम्हारा है मानवता ही बस नारा है। तुम कूदो इस सागर में कुछ-क्षण बाद किनारा है।।