चंद्र-प्रत्युत्तर१

पल पल यूहीं अपने गर संकल्प सभी तुम तोड़ोगे,
शीशे से टूटे सपनों को फिर कैसे तुम जोड़ोगे।

फर्क नही पड़ता तुमको ,इनके जुड़ने या तुड़ने से,
मिलेगी कैसे अपनी मंजिल ,गलत राह पर मुड़ने से।

दायित्वों को करते पूरा ,तुम अपना तन मन देकर,
करते रहे प्रकाशित प्रतिपल ,इस जग को तुम हे!दिनकर।

पुष्पों की कोमलता ,मरुथानो में कहीं न लुट जाए,
बंजर भूमि खोकर इनको, और अधिक न घुट जाए।

व्यस्त नही हम साथ हैं तेरे ,खुशियां हों या दुख सारे,
प्यारा कोई और नही,जितने लगते हो तुम प्यारे।

तन्हाई और रुस्वाई की, कमर तोड़ने आएंगे,
मित्र मेरे हम साथ वहां पर फिर हुड़दंग मचाएंगे।

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