वियोगी का खत!

सम्वाद स्थापित करता हूँ मैं अपने लेखों के द्वारा
चाहे स्वयं से,परमात्मा से या प्रेयसी से।
मैं अभी प्रेयसी से सम्वाद करूँगा..
प्रिय प्रियतमा!

क्या तुम्हें मेरी याद आती है? मुझे लग रहा है कि अभी इस वक़्त मैं सो नही पा रहा हूँ।अभी एकाध घण्टे से बिस्तर से यकायक उठ कर छत पर खुले आसमान के नीचे टहलने की कोशिश की फिर भी राहत नही,आप मेरे मानसपटल से रोम-रोम तक मुझे घेरे हुए हैं।
ज्ञानी नही हूँ किन्तु सहज हूँ सोचा अपना हाल ही लिख दूं!

और मेरी भाग्य में शायद आपका सानिध्य नही इसलिए आप ने अभी तक कोई प्रयास नही किया।
उसके बाद भी प्रिय-प्रेयसी आपकी अनुभूति मेरे अन्तस् में प्रतिपल छायी हुई है!आपके दर्शन से श्रीकृष्ण के दर्शन होते है।
आपके प्रति ये सिद्दतता मुझे परिमार्जित करती जाती है!अलौकिक सानिध्य भी प्राप्त होता है।
परमात्मा का प्रत्येक फैसला मुझे स्वीकार है!
ये भ्रम है लोगों का की रैना में सूर्य विश्राम करता है।
सूर्य अपने जन्म से अबतक अनवरत है;ये तो पृथ्वी का चक्रण है जो लोगों को भ्रमित कर देता है।
आमतौर पर सूर्य को लोग अतिशक्तिशाली मानते हैं किंतु ये भी अज्ञानता है लोगों की।
सूर्य से पहले भी निशा थी और सूर्य के बाद भी निशा होगी।
मूलतः निशा ही ईश्वर है सूर्य का।
इसलिए हे देवी हे दिव्य मैं आपके ईश्वररूपी अनन्त शाश्वत स्वरूप को प्रतिपल वन्दन करता हूँ।
रही बात मिलन की है तो जिस दिन ये प्राण निकले मैं भी रैना में विलीन हो जाऊंगा!आपकी लंबी जुल्फों में अनवरत विश्राम करूँगा!..
प्रेम और विशुद्ध प्रेम के बहाव में एक सूर्य वास्तविक रूप से अस्त होगा।
आपका प्रवेश ही मेरे जीवन को विशिष्ट यामिनी में परिवर्तित कर गया।
मेरी इतनी सामर्थ्य कहाँ की मुझे रात नसीब हो,और नींद नसीब हो।
किन्तु जिस दिन ये दीपक बुझेगा उस दिन स्वतः अखण्ड-निशा में मोक्ष को प्राप्त करूँगा..

अंत मे
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो अपनी कृपा आप पर बरसाये और आप विशिष्ट-से-विशिष्ट हों।

आपका प्रेमी
प्रभाकर द्विवेदी"अहिंष्य"

Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!