जागृति का दर्द!

जाने को जी चाहता है अब
मेरा यहाँ कोई प्रयोजन शेष नही
मेरा अस्तित्व विलीन हो चुका है अब
फिर भी क्या मैं जा पाऊंगा?कभी नही शायद!
जबसे ये ज्ञात हुआ है कि मैं शाश्वत हूँ तबसे तो बस आँसू ही आंसू बहते जा रहे हैं!ये फिर थमेंगे फिर बहेंगे...

मैं ही तो तुम हूँ
तुमसब सोये हुए हो काफी देर से
जब नींद पूरी हो जाएगी तब उठोगे भी!
कम-से-कम तबतक तो प्रतीक्षा करूँगा!
फिर हँसी-ठिठोली किया जाएगा।
मुझे भी कुछ सखा मिल जाएंगे!
अभी बिलकुल अकेला हूँ न!

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