जागो!

सृष्टि के अनुसार तो सब समान हैं,प्रकृति साम्यवादी होती है;फिर इतने सारे मजहब, जाति विरादरी क्यों अस्तित्व में हैं?
इसकी जिम्मेदार हमारी नादानी हैं,हम नफरती भेड़ियों को अपना सरदार बना लेते है; बिना परिणाम जाने।

    मयावती जी भी दलित हैं और जितना रुपया वो स्वयं के साजो-सज्जा पर खर्च करती है प्रतिदिन, यदि उतना रुपया देश के एक-एक गांव में शिक्षा हेतु खर्च करने लगे तब मैं उनको दलितों का उद्धारकर्ता मानू।

दलित शब्द है उनके लिए जो असहाय हैं,पीड़ित है न की पीड़क है।आखिर इतने उपद्रवों का जिम्मेदार कौन है।
मुझे नही लगता कि भारत मे अब भी कोई दलित शेष है।

मायावती जी दौलत की देवी हैं
अपना समस्त धन किसी ईमानदार शिक्षकों के समूहों को दान दे दे गर तो जो शेष दलित है वो भी सबल हो जाएंगे।

दूसरी बात मोदी जी से
कोई शिलान्यास बिना किसी विपक्षी दल के आलोचना किये नही करते हैं!क्या ये भय है या व्यापार का तरीका है।

देश मे शिक्षा की स्थिति जबतक नही सुधरेगी
ये उपद्रव होते रहेंगे! संविधान के प्रति आस्थावान व्यक्ति अपने मौलिक कर्तव्यों को प्रथम प्राथमिकता देता है द्वितीय में वो मौलिक अधिकार को रखता है।

चाहे पद्मावत का विरोध हो या सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का विरोध हो,क्या इसी तरह संसाधन को नष्ट कर विरोध होता है,क्या राजपूतों के यही संस्कार हैं और दलितों के यही लक्षण हैं।

मेरा देश सोया हुआ है
जागो मेरे भाइयों एवं बहनों
तुम नही जागोगे तो कौन सम्भालेगा
इन रक्तपिपासु नेता गणों से मेरे भारत को।

जागो जागो जागो
और भारत को महानता के शिखरतम स्थल पर ले जाओ!
जागो प्यारे जागो!
नफरत की खाद बना-बना कर उसमें पुष्प खिलाओ।
क्यों तुम्हे दलित बना रहना अच्छा लग रहा है?



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