प्रेम ज्योति एक सत्यकथा!

उस कॉलेज में सब मुझसे प्रभावित थे,सब-के-सब मुझे प्रेम भी करते थें किन्तु प्रकृति ने मुझे ज्यादा प्रेम देने की कोशिश की..
उस वक़्त हाथ मेरे कांपते थे तो मेरे सारे नोट्स प्रकृति ही लिखती थी..वो ज्यादा-से-ज्यादा मुझसे बात करने की फिराक में रहती। प्रतिभाशाली है वो प्रकृति का इस-कदर मुझसे बात करना...उस नगर में चर्चा का विषय बन गया...फलस्वरूप मुझे लोग एक विशेष प्रश्नवाचक दृष्टि से भी देखना प्रारंभ किये... किन्तु मुझे कोई फर्क नही पड़ता मैं चाहता था कि प्रकृति का चयन प्रशासनिक सेवाओं में हो इसलिए मेरी पुरजोर कोशिश थी उसे संवर्द्धित करने की।
एक ही महीने बाद मुझे दूसरे कॉलेज जाना पड़ा,प्रकृति से फिर मेरी भेंट नही हुई...हा फ़ोन पर बात हो जाया करती थी।
   मुझे स्मरण है एक बार प्रकृति किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने हेतु गोरखपुर आयी थी..तब उसने मुझसे फ़ोन पर कहा था
"जानते हैं प्रभाकर जी,जिस वक़्त और जितने क्षण मेरी शरीर गोरखपुर में रही...बस वही उतना पल मेरे लिए स्वर्ग से भी ज्यादा दिव्य लगा....।मसलन एक घण्टे के गोरखपुर प्रवास के दौरान उसने मुझे ये बाते बताई।"

जब प्रकृति अपना जीवन-साथी चुन रही थी,या चुनने के बाद उसने मुझसे मिलवाया और स्नेहवत आज्ञा ली विवाह करने को।मैंने आज्ञा दिया...जीवन भर समृद्ध रहने की दुआएं भी दी।

प्रकृति तुम अपनी जीवटता बनाये रखना

शून्य
प्रभाकर!

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